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हँसी की महिमा :: डॉ सत्यनारायण पाण्डेय
प्रस्तुतकर्ता अनुपमा पाठक
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22 जुलाई 2017
काम के बोझ ने,
हँसना भूला दिया है
हम खुलकर हँस भी सकें,
वैसी जगह कहां है?
हां,
है ऐसी ही बात,
अब तो हँसी भी रूठ गई है ---
इसी लिए तो
जिंदगी बोझ बन रही है
अरे भाई!
अब भी सचेत हो जाओ
असमय मौत को तो न बुलाओ
हँसो
छोटी छोटी बातों पर भी,
मत खोजो हास्य के लिए बड़ा जलसा
या जलवा...
अगर यही हाल रहा तो,
मनुष्य बन कर रह जायेगा मलबा !
हंसी
गाहे-बेगाहे,
अवश्य आनी चाहिए --
कोई पास न भी हो तो, यह नुक्सा अपनाईये...
ऐसी व्यवस्था की ही जानी चाहिए... !
याद करें
कभी तो आयी होगी हँसी खुलकर
करें उन्ही पलों की याद चुन चुन कर
अरे भाई! जितना अच्छा होता है हँसना,
उससे भी कहीं अच्छा है - दूसरों को हँसाना
करें सायास प्रयास ---
जो भी आये पास वह भी हँसता हुआ जाए...
क्यों? हम मनहूस बन बैठें
कि दूसरे की हँसी भी छिन जाए... !
यह हम सब जान लें
हँसने और हँसाने से अच्छा---
कोई काम नहीं,
तनाव से मुक्ति का उपाय भी तो यही है.
तनाव
शरीर को झकझोर देता है,
खुलकर हँसना भी --
शरीर को झकझोरता ही है,
पर है दोनों में कितना अन्तर!
तनाव की झकझोर शरीर को तोड़ देती है
हँसी भी झकझोरती है,
पर कर तरोताजा मन-मस्तिष्क को ----
नई उर्जा भर देती है
जीवन को एक सहज सुन्दर मोड़ देती है... !!
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अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
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इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
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