रुक जाना...

चलना ही जीवन है...
बहुत सुना है
इसे माना भी 


सच भी है
कि रुके हुए तो जल भी सड़ जाता है... !


पर
कुछ ऐसे दौर होते हैं...
थका-थका सा
कुछ ऐसा टूटा हुआ सा मन होता है...


कि रुक जाने के सिवा
कोई विकल्प नहीं होता
और यही शायद सबसे उपयुक्त उपक्रम भी... 


कि
गति के नाम पर
गलत राह पर बढे जाना
कौन सा गति का सम्मान है ?!


कई बार
हम जाने-अनजाने
ऐसे हो जाते हैं अपने कृत्यों-व्यवहारों में
जो कि स्वयं जीवन का अपमान है !!


तो
तनिक रुक जाते हैं...


बहुत भाग लिया
अब स्थावर हो कर देखें...


क्या अब भी वो पीछे आता है
दुःख हमें ढूंढ-ढूंढ कर रुलाता है... !!

2 टिप्पणियाँ:

Anita 12 जुलाई 2017 को 9:52 am बजे  

अँधेरा क्या सताएगा प्रकाश को..दुःख क्या रुलाएगा उल्लास को..

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 12 जुलाई 2017 को 12:49 pm बजे  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरूवार (13-07-2017) को "पाप पुराने धोता चल" (चर्चा अंक-2665) (चर्चा अंक-2664) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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