सारा दोष मेरा है...

हमने
देख लिया
अपना होना...

हमने
ये दुनिया भी
देख ली... 


हर जुड़ने वाला
उतना ही खरा है...
फिर
मन मेरा क्यूँ
आखिर इतना भरा भरा है... 


सारा दोष मेरा है...

जुड़ने जाते हैं... 


बार बार ठोकर खा कर भी
इस दुनिया की मंशा भांप नहीं पाते हैं...


तो मन चल अब 

अपनी उस खोह में
जहाँ किसी का भी 

आना वर्जित हो...

वहीँ
झूठ फ़रेब की मार से टूटे हुए दिल को
ज़रा सी शान्ति तो अर्जित हो... !!


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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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