यह विषय दिलचस्प है — मानवीय भावना और संवेदनाओं से जुड़ी हर चीज कितनी नाजुक है...जैसे आपने कविता को आंसू की बूंद में तब्दील कर दी, वैसे ही गालिब ने खून की औकात बताई...जो आंख से ही न टपके वो लहू क्या है?
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (31-05-2015) को "कचरे में उपजी दिव्य सोच" {चर्चा अंक- 1992} पर भी होगी। -- सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। -- चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है। जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये। हार्दिक शुभकामनाओं के साथ। सादर...! डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक
11 टिप्पणियाँ:
मैंने तो सुना है जो हीरे मोती से अनमोल होते हैं वह किसी के मोहताज नहीं होते...
वाह! कितनी सुन्दर बात कही आपने अनिता जी...
आँखों से झरती इन अनमोल कविताओं को सहेजे और हमारे साथ साझा करे
आभार
यह विषय दिलचस्प है — मानवीय भावना और संवेदनाओं से जुड़ी हर चीज कितनी नाजुक है...जैसे आपने कविता को आंसू की बूंद में तब्दील कर दी, वैसे ही गालिब ने खून की औकात बताई...जो आंख से ही न टपके वो लहू क्या है?
लाजवाब
कवितायें.... खुशी के आँसू से भी निकलती होगी न....
बहुत सुन्दर
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (31-05-2015) को "कचरे में उपजी दिव्य सोच" {चर्चा अंक- 1992} पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक
गहन ,अनमोल उदगार !! बहुत सुंदर रचना !!
अद्भुत , लेखन, कई बार आपकी कवितायेँ पढ़ते-पढ़ते कब आँखें नम हो जाती हैं पता भी नहीं चलता .....
हमेशा साथ का वादा कर फिर क्यों आँखों से बहा दी गई कविता
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