आँखों से बह जाती है कविता...!

समझा गया
तो मूल्य है उनका,
अन्यथा तो खारा जल ही है वो...,


सच! कैसी विडम्बना है...


हीरे मोती सा
जो अनमोल है...
वह आंसू
खारे जल की तरह
वृथा ही बह जाता है...!



आंसू पोंछने वाले हाथ
कर लेते हैं किनारा
दग्ध हृदय
रोता ही रह जाता है...!


तब...
एक बूँद आंसू सी
आँखों से बह जाती है कविता...!!

11 टिप्पणियाँ:

Anita 29 मई 2015 को 8:09 am बजे  

मैंने तो सुना है जो हीरे मोती से अनमोल होते हैं वह किसी के मोहताज नहीं होते...

अनुपमा पाठक 29 मई 2015 को 9:14 am बजे  

वाह! कितनी सुन्दर बात कही आपने अनिता जी...

रचना दीक्षित 29 मई 2015 को 1:06 pm बजे  

आँखों से झरती इन अनमोल कविताओं को सहेजे और हमारे साथ साझा करे
आभार

Rajkumar 29 मई 2015 को 5:20 pm बजे  

यह विषय दिलचस्प है — मानवीय भावना और संवेदनाओं से जुड़ी हर चीज कितनी नाजुक है...जैसे आपने कविता को आंसू की बूंद में तब्दील कर दी, वैसे ही गालिब ने खून की औकात बताई...जो आंख से ही न टपके वो लहू क्या है?

Tamasha-E-Zindagi 29 मई 2015 को 9:34 pm बजे  

लाजवाब

Shekhar Suman 30 मई 2015 को 6:11 am बजे  

कवितायें.... खुशी के आँसू से भी निकलती होगी न....

Onkar 30 मई 2015 को 11:29 am बजे  

बहुत सुन्दर

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 30 मई 2015 को 12:24 pm बजे  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (31-05-2015) को "कचरे में उपजी दिव्य सोच" {चर्चा अंक- 1992} पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

Anupama Tripathi 3 जून 2015 को 3:36 am बजे  

गहन ,अनमोल उदगार !! बहुत सुंदर रचना !!

Anita Maurya 3 जून 2015 को 7:34 am बजे  

अद्भुत , लेखन, कई बार आपकी कवितायेँ पढ़ते-पढ़ते कब आँखें नम हो जाती हैं पता भी नहीं चलता .....

Unknown 5 जून 2015 को 12:01 pm बजे  

हमेशा साथ का वादा कर फिर क्यों आँखों से बहा दी गई कविता

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