अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

आसमान और भी हैं...!

जिस बेफ़िक्री से
आसमानी हदों को
नापते हैं परिंदे...
हम उस स्वच्छंदता की
करते हैं बंदगी!


पल पल बेड़ियों में जकड़े होने का
एहसास साथ है...
फिर भी
हौसलों के दम पर
है आज़ाद इंसानी ज़िन्दगी! 


परिंदों की तरह
उस अम्बर तक
न सही,
उड़ने के लिए
आसमान और भी हैं...


ऊँचाई सिर्फ बादलों के पार ही नहीं होती
ज़िन्दगी में बनाने को कीर्तिमान और भी हैं...!!!

1 टिप्पणियाँ:

dj 3 मई 2015 को 5:35 pm  

बहुत ही शानदार और उत्साहवर्धन करती प्रस्तुति आदरणीया।

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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