अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

बची रहे नमी...!

लिखी जाती रहें
कवितायेँ...


बहती ही रहें
भाव सरिताएं...


कि...
शुष्कता के इस दौर में- 


आवश्यक है
कहीं तो बची रहे नमी...


बनी रहे...
सस्नेह झुके हुए आकाश के नीचे
विस्तार लिए ज़मीं... !!


सर पर उसका हाथ है...
फिर कहाँ कोई कमी...


ज़िन्दगी!
चलती रह तू
कितने भी
आ जाएँ तूफ़ान
कब है तू थमी... !!


2 टिप्पणियाँ:

Dr.NISHA MAHARANA 11 मई 2015 को 2:34 am  

jindgi bhala kab thamti hai .....sundar bhaw ...

Anita 12 मई 2015 को 5:30 am  

ज़िन्दगी!
चलती रह तू
कितने भी
आ जाएँ तूफ़ान
कब है तू थमी... !!
बहुत सुंदर अहसास..

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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