अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

यूँ मिली ख़ुशी...!


कल किसी ने कहा... ख़ुशी लिखो... ख़ुशी जियो... ख़ुशी तलाशो... खुश रहो... इन आशीषों को बटोर रहे थे और अनुशील के सैकड़ों ड्राफ्ट्स में कुछ एक खोयी कवितायेँ ढूंढ रहे थे कि यूँ मिली ख़ुशी... एक पुराने ड्राफ्ट से... तो इसे ही सहेजा जाए... आज... आज एक नया दिन है... हर रोज़ एक नया दिन होता है...!


बिना किसी आहट
बिना किसी शोर के
आती हैं खुशियाँ...



सुखद आश्चर्य से
भर देती है मन प्राण


अँधेरे को
प्रगट होते ही जैसे
हर लेता है सूरज...


वैसे ही...


आपका आना है
खुशियों की धूप का खिलना...
बारिश की बूंदों से आरपार हो प्रकाश का
बन इन्द्रधनुष
गगन से मिलना...


आपका आना है
उदास सी कविताओं में
श्रद्धा विश्वास का पुनः पलना...
धुंधले दीखते दृश्यों का
आंसुओं के प्रभाव से तत्क्षण निकलना...


और...
खिल जाना आस बन कर...

स्पंदित हो जाना आती जाती सांस बन कर... ... ... !!

5 टिप्पणियाँ:

Yashwant Yash 1 मई 2015 को 7:48 am  

उत्साहवर्धक कविता

सादर

Anita 1 मई 2015 को 12:08 pm  

सुंदर भाव...खुशियाँ तो हर ओर बिखरी हैं...हवा और धूप की तरह..हम ही कभी कभी उनकी तरफ पीठ कर लेते हैं..

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 1 मई 2015 को 6:32 pm  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (02-05-2015) को "सारी दुनिया का बोझ हम उठाते हैं" (चर्चा अंक-1963) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
श्रमिक दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक
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Onkar 3 मई 2015 को 4:25 pm  

बहुत सुन्दर

dj 3 मई 2015 को 5:36 pm  

अति सुन्दर

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
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