अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

पहली चिट्ठी...!

१८ जनवरी, २०१२

नानी,

आप कैसी हैं...? आपको याद है आज से एक वर्ष पूर्व लगभग इसी समय कभी आपसे बात हो रही थी... स्काइप पर..., क्या बात कर रहे थे हम...? अरे वही पुरानी बातें... आपकी ऊपर जाने की हड़बड़ी और हमारा वही कहना बार बार कि अकेले मत जाना, हमें भी साथ ले चलना... क्यूंकि मरने का मन तो मेरा भी है...! आज स्काइप पर ली गयी तस्वीर गुज़र गयी आँखों के सामने से... यही तो अंतिम बार था जब बात हुई थी... फिर तो महीनों आपके दर्शन नहीं हुए... और आप जुलाई में हमेशा के लिए चली भी गयीं दूसरी दुनिया में...! हमें भी क्यूँ नहीं ले गयीं अपने साथ...? वैसे साथ ले जाने की मंशा थी भी कहाँ आपकी... वहाँ थे नहीं, होते तब भी आप अकेली ही चल देतीं... खैर, अब वहाँ कैसा है सबकुछ... सारे कष्टों से दूर खुश हैं आप? नाना से भेट हुई होगी आपकी...? अभी भी वे किसी किताब को लेकर व्यस्त होंगे... लेखन के लिए वहाँ का एकांतवास उनके लिए बड़ा उपयुक्त होगा ... अब तो आप भी चली गयीं हैं... नाना खुश तो होंगे ...
अब इन कुछ महीनों में आप भी उस माहौल में रम गयीं होंगी... जमशेदपुर याद आता है कभी... बालकनी को आपकी बहुत याद आती है... मम्मी से बात होती है तो पता चलता है कि घर का हर कोना आपको याद करता है... सब्जी काटने की आपकी तत्परता भुलाये नहीं भूलती... और अगर हममें से किसी ने सब्जी काट डाली तो फिर आपका रूठ जाना भी याद आता है... आपकी पूजा, आपकी बातें, आपके आंसू, आपका टहलना... आपके नियम सब याद आते हैं...! आपसे किये गए कितने ही झगडे आँखों के सामने से तैर जाते हैं... किसी बात से नाराज़ हों तो क्षमा कर दीजियेगा...
आप तो जल्दी जल्दी चली गयीं... मिलने का अवसर नहीं दिया... सोचा आज एक पत्र लिख दें आपको... नाना जी को भी पत्र लिखेंगे कभी... उनको हमारा चरणस्पर्श प्रणाम कहियेगा...!
कितनी जल्दी समय बीत जाता है... इस नए साल में आप नहीं हैं और ठीक एक साल पीछे कर दें अगर कैलेंडर को तो इस वक्त हमलोग बात कर रहे थे... और स्काइप पर आपकी फोटो ले ली थी... कहाँ पाता था कि यह अंतिम दर्शन और अंतिम बातचीत है... बोलती हुई अंतिम तस्वीर आपकी जिसे अनजाने ही हमने क्लिक कर लिया था...!
आप अच्छे से रहिएगा... अपना और नानाजी का ख्याल रखियेगा!
शेष फिर कभी...
और अब रुकते हैं... आपको कुछ कुछ कहना था... इसलिए शायद यह पत्र लिख रहे हैं! अब विराम की ओर बढ़ते हुए कुछ पंक्तियाँ...


एक समय के बाद

हर कोई चला जाता है...!


रहते हुए की गयी हो परवाह पर मरणोपरांत कोई इतना क्यूँ याद आता है...?


आपको अभी कुछ दिन और रहना था नानी, अभी कुछ और आगे बढ़नी थी कहानी...!


पर चलो कोई बात नहीं, संपर्क में रहना... कभी कभी सपनों में आकर कुछ कुछ कहती रहना...!


प्रणाम!



*** *** ***

सुबह के चार बजे हैं... खूब बारिश हो रही है बाहर... और ड्राफ्ट्स में पड़ी इस चिट्ठी तक पहुंचे तो आँखें भी नम हुईं... कितने समय पहले लिखा... आज पोस्ट कर ही दी जाए चिट्ठी... शायद पहुँचते हों सन्देश उस जहां तक भी... कौन जाने!
चलें अब कुछ कुछ काम निपटाएं... कि सुबह हो गयी है अब...!

2 टिप्पणियाँ:

कालीपद "प्रसाद" 11 मई 2015 को 5:00 am  

बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति !
A गज़ल्नुमा कविता (न पति देव न पत्नी देवी )

Anita 12 मई 2015 को 5:08 am  

जरुर पहुंचती है चिट्ठी...बल्कि जब तक कागज पर उतरे उससे भी पहले...

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

ब्लॉग से जुड़िए!

कविताएँ