अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

पुरानी चिट्ठियों से...!


हँसते हुए सूरज से
प्रभावित
पल पल है...! 


हमारी आँखों में
बेसुमार नमी है
भींगा भींगा सा जल थल है...!!

(८ जून २०१०)

*** *** ***


मौसम बदलता है
नयी कोंपले फूटती हैं
और खिल जाती है हरियाली...


उदास क्यूँ हों?
पतझड़
इस बात का संकेत है
कि बसंत ऋतू है आने वाली...



झेल जाओ ये तूफ़ान
लबों पे मुस्कान लिए...
कि अंधियारी रात के बाद ही
क्षितिज पर छाती है लाली... !!

(२ जून २०१०)

*** *** ***

जब तक है जिजीविषा
तब तक रहेगा जीवन...
और जबतक है जीवन
तब तक जन्म लेती रहेंगी
अनंत संभावनाएं!


इन्हीं की खातिर
धागे से धागा जोड़
बढ़ते जाना है...
नन्हे दीप को धैर्य से
बस जलते जाना है... 


क्यूंकि
लेकर हृदय में असीम भावनाएं
हर पल जन्म ले रही हैं अनंत संभावनाएं...

(१ जून २०१०)

3 टिप्पणियाँ:

देवेन्द्र पाण्डेय 10 मई 2015 को 7:22 am  

ऐसी चिट्ठियां तो याद आएंगी ही।

Onkar 10 मई 2015 को 8:22 am  

सुन्दर रचना

Anita 12 मई 2015 को 5:18 am  

आशा का दीप जलाना है..हर हाल में मुस्कुराना है..

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कुछ बातें अनूठी है!
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