अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

दोस्त, तू पल पल में सदियाँ जिए...!

याद है…
रश्मिरथी की पंक्तियाँ कंठस्त कर
सम्पूर्ण रूप से उसमें पैठ
जब कर्ण के संवाद बोले थे तुमने
माता कुंती रो पड़ी थी!


वो कर्ण-कुंती संवाद
आज भी नम कर जाता है…
उन्हें पढ़ते हुए
हमेशा तुम याद आते हो...
कि उस किरदार को
उसी सिद्दत से मंचित किया था तुमने…! 


कर्ण सा ही विराट हो  व्यक्तित्व
अपरिग्रह का सिद्धांत आत्मसात किये
दान हेतु हो संचय
सर्वत्र फैले कीर्ति तुम्हारी, हे धनंजय!


जन्मदिन पर यही शुभकामना…
पूरे हों सारे सपने, हो सिद्ध हर कामना
अपरिमित खुशियों का सागर लिए
दोस्त, तू पल पल में सदियाँ जिए…!!!





ये तुम्हारी ही फेसबुक वाल से उन  दिनों की एक तस्वीर, हमने सहेज ली है यहां! पुनः ढेरों शुभकामनाएं!

Stay blessed...
Many many happy returns of the day, Manas :)

5 टिप्पणियाँ:

अरुण चन्द्र रॉय 6 मई 2015 को 12:47 pm  

achhi kavita

manas mishra 6 मई 2015 को 5:18 pm  

bahut saara thanks...

Dilbag Virk 6 मई 2015 को 5:23 pm  

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 7 - 5 - 2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1968 में दिया जाएगा
धन्यवाद

Sanju 7 मई 2015 को 12:21 pm  

सुन्दर व सार्थक प्रस्तुति..
शुभकामनाएँ।
मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

रश्मि शर्मा 7 मई 2015 को 7:14 pm  

अच्‍छी कवि‍ता...शुभकामनाएं

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कुछ बातें अनूठी है!
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