अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

जाने कब हम गुज़रा हुआ कल हो जाएँ...!

कितने ही सवाल किये...
सभी अनुत्तरित रहे...
ज़िन्दगी अपनी धुन में चलती रही...
ये देख चेतना अपनी नम आखें मलती रही...


गगन पर खूब बादल छाये...
धरा का आँचल भिंगो आये...
वहीँ कहीं पर धरती के हृदय से लगी हरी घास पर चलते हुए...
प्रश्नों को एहसास हुआ मचलते हुए- 


कि निहित हैं उत्तर सारे प्रश्न में ही 


इसलिए चुप रहती है ज़िन्दगी
मौन ही में चलती रहती है उसकी बंदगी 


वो बहुत चाहती है हमें...
बस इम्तहान लेती है... थाहती है हमें...


आँखें मूँद कर महसूस किया तो पास मिली...
प्रश्नों से जूझती ज़िन्दगी बन उत्तर की आस खिली...


अब बस यही प्रार्थना है प्रश्न सकल हल हो जाएँ
आ ज़िन्दगी! अभी गले मिल... जाने कब हम गुज़रा हुआ कल हो जाएँ...!


4 टिप्पणियाँ:

Ashok Saluja 7 मई 2015 को 9:02 am  

सटीक .....ये ही सच है ...बाकि अनबुझ पहेली ..स्वस्थ रहें |

Anita 7 मई 2015 को 10:17 am  

सुना है गुणीजनों से, सारे प्रश्न तभी हल होते हैं जब सारे प्रश्न खो जाते हैं..खो जाते हैं जिंदगी की असीम शून्यता में..

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 8 मई 2015 को 1:31 pm  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (09-05-2015) को "चहकी कोयल बाग में" {चर्चा अंक - 1970} पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक
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sushma 'आहुति' 10 मई 2015 को 4:11 pm  

खुबसूरत अभिवयक्ति.....

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