अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

आश्वस्ति...!

हताश... निराश... देख कर मुझे,
पास मेरे आई...
कविता मुस्कुराई...
और बोली--


ये दुनिया है
ये कुछ भी कहेगी...
कई बार ऐसा होगा
ज़िन्दगी
ज़िन्दगी नहीं रहेगी... 



ऐसे क्षणों के लिए
तुम्हें
खुद को
तैयार रखना होगा...
दुनिया में ही रहती हो न?
इन दस्तूरों से
सरोकार रखना होगा...


हताशा घेरेगी
आँखें भी बरसेंगी,
रो लेना...


नाराज़ हो
दूर किया न खुद से खुद को?
फिर से अपनी ही लेना...



कि
मन ईश्वर है
और ईश्वरीय इच्छा से जो होता है
वह सब सार्थक है...



तुम
इसमें कहीं नहीं हो...!
अब तो चुप हो जाओ पगली
जाओ
मैं आश्वस्त करती हूँ...
तुम सही हो...!!!




8 टिप्पणियाँ:

Anita 19 मई 2015 को 12:11 pm  

कविता सच कहती है...

ब्लॉग बुलेटिन 19 मई 2015 को 6:25 pm  

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, रावण का ज्ञान - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Madan Mohan Saxena 20 मई 2015 को 7:41 am  

मन ईश्वर है
और ईश्वरीय इच्छा से जो होता है
वह सब सार्थक है...
हृदयस्पर्शी भावपूर्ण प्रस्तुति.बहुत शानदार भावसंयोजन .आपको बधाई

dj 20 मई 2015 को 12:23 pm  

ऐसे क्षणों के लिए
तुम्हें
खुद को
तैयार रखना होगा...
दुनिया में ही रहती हो न?
इन दस्तूरों से
सरोकार रखना होगा...

सुंदर। यथार्थता समेटे हुए भावपूर्ण प्रस्तुति।

प्रतिभा सक्सेना 21 मई 2015 को 6:34 am  

मन है ही ऐसा - कहाँ तक कोई काबू करे
- देखते चलो मन का तमाशा ,ये दुनिया है !

Tushar Rastogi 22 मई 2015 को 7:23 pm  

सुन्दर कविता

Onkar 23 मई 2015 को 1:44 pm  

बहुत सुन्दर

kavita pandya 5 जून 2015 को 11:50 am  

सच कहती है कविता...
कविता को खुद से दूर क्यों करा...

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कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
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कविता तो मुझसे रूठी है!!"

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