अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

कितने ही शीर्षक... या फिर शीर्षकविहीन...? कौन जाने!

... ... ... !!

तीन पग में सृष्टि नाप लेने की महिमा... ऐसा ही कुछ... है ये  "... ... ... !!" मेरे लिए...
सब तो नाप लिया आपने इन बिन्दुओं से... शब्द ऋचाएं... जीवन... प्रेम... ईश्वर... मौन... और हमें भी... शब्द तो घेरे रहते ही हैं आपके, इन बिन्दुओं का प्रभाव हम पर उससे कहीं अधिक गहरा है... कितना कुछ अनकहा है न इसमें... कितना तो रहस्य समाया हुआ है इन चिन्हों में जिसे बड़े ही तरतीब से सजाया हुआ है आपने...! कब ये मेरा हो गया... पता ही नहीं चला... जब पिछली बार मिलना हुआ तब समय का अभाव था न... अब कभी मिले तो पूछेंगे... और कहेंगे... भरिये  इन रिक्त स्थानों को... बताईये इसका रहस्य... पर फिर सोचते हैं... क्या मिलना... क्या पूछना... सब तो ज्ञात है... सब तो जानते ही हैं हम... कि अब का नहीं है... रिश्ता सदियों सदियों सदियों पुराना है... भाव और भाषा का... तब का जब शायद भाषा नहीं रही होगी...  उस संसार में कोई शब्द नहीं रहा होगा... एक दूसरे से यूँ जुड़े होंगे... जुड़ते होंगे लोग... जैसे एक ही हों... संवाद की कोई आवश्यकता ही नहीं रही होगी... कि अपने ही हृदय से कोई बोल कर बात करता है क्या...! सब तो संप्रेषित है... जीवन तब कितना सरल रहा होगा... मन पर मन की छुवन को किसी की नज़र न लगती होगी... और ये बिंदु... आंसू नहीं हो कर कोई टिमटिमाते तारे होंगे... जो नौ कदम चल कर दो विस्मयादिबोधक चिन्हों तक आते हैं... और ये दो साथ खड़े चिन्ह साथ होते हैं हमेशा... कोई नहीं आता इनके बीच... कोई नहीं... कोई भी नहीं... कोई विसंगति नहीं... कोई विरोधाभास नहीं... कोई विडम्बनाएं नहीं... कुछ भी इनकी परम शान्ति को भंग नहीं करता और ये तपस्या में लीन एकाकार ऐसा अव्यय हो जाते हैं जिसके प्रताप से नौ कदम चल कर आये तारों का भाग्य खिल उठता है...
जाने क्या क्या बक रहे हैं हम... यूँ ही... अब चुप हो जाना चाहिए... शेष फिर कभी... इन बिन्दुओं की रफ़्तार बनी रहे... आपके कलम की धार बनी रहे... खिला रहे आपका संसार...!

*** *** ***

कुछ यादें... पेड़ों की छांव... और... कुछ आत्मीय संवाद

रोहन... याद आती है आपकी कवितायेँ... आपकी ढ़ेरों शरारतें... आपकी बदमाशियां... और आपका स्नेह भी... कितनी बार जब कितनी ही हताशाओं ने घेरा तो एक शरारती बच्चा था उसने अनजाने ही कुछ ऐसी बातें कहीं जो हमारे लिए मंत्रोचार से  कम नहीं था... इतना कुछ है कि लिखना संभव ही नहीं... वो आप ही थे जिसने किसी शाम विश्वनाथ मंदिर पर उस बरगद के पेड़ की छांव में बैठी परेशान दीदी को रश्मिरथी की वो पंक्तियाँ याद दिलायीं थीं... 

केशव पर चिंता डाल अभय हो रहना...
उस पार्थ भाग्यशाली का भी क्या कहना...

याद है फिर हम क्या पूछे थे... हमने पूछा था... अपने आप को केशव कह रहे हो... पता है आपने जो उत्तर दिया था... आज भी वह याद कर के एक मुस्कान आ जाती है चेहरे पर...! याद आया...? अच्छा चलो बता देते हैं... आपने बोला था... "खुद को केशव नहीं, आपको पार्थ कह  रहा हूँ"! कितनी बड़ी बात कही थी आपने... शरणागत होने पर भी कितनी ही समस्यायों से घिरा ही होता था न पार्थ... कर्ताभाव से जकड़ा हुआ... कृष्ण पर सब छोड़ मग्न रहना सीखने के लिए तो पूरी गीता सुननी पड़ी न उसे... गीता तो हमने भी पढ़ी है... पर आत्मसात कहाँ किया... आत्मसात कहाँ हुआ कुछ भी... तभी तो कुछ भी नहीं बदला... आज भी "यह" पार्थ जूझ ही रहा है "केशव"! 
फिर वो मधुशाला की पंक्तियाँ होती थी...  जो आप गाते गुनगुनाते थे कभी खुद... कभी मेरे कहने पर... फिर वो कितने ही गीत... सब याद आता है... और साथ में आपकी शैतानियाँ भी...!
इतने समय बाद यूँ यहाँ मिलना बेहद सुखद है... अब जब चीज़ें छूट रहीं हैं... ज़िन्दगी फिसल रही हैं हाथों से तो जो कुछ अनमोल था वो खोया हुआ कुछ मिल जाए तो फिर सहेज लेना चाहिए न... यूँ मिलने का शुक्रिया रोहन!
फिर से लिखिए... कवितायेँ... कहानियां... अपने लिए... अपनी दी के लिए... हम सब सहेजेंगे!
कितना कुछ है लिखने को पर अब आँखें भर आई हैं... इसलिए अब विराम लेते हैं यहीं आज... शेष फिर कभी...!

*** *** *** 

चिट्ठियां...!

सालों पहले लिखी चिट्ठियों को अब तक किसी ने सहेज कर रखा है... कवितायेँ... बातें... कितना कुछ...! क्षणभंगुर संसार में नित छूटते टूटते रिश्तों के बीच ये शब्दों से जुड़ा रिश्ता इतना बड़ा संबल हो सकता है... ये सोच कर अभिभूत हैं... सच! राकेश भैया, आपने जब मेरी लिखी उतनी पुरानी चिट्ठियों को स्कैन कर के भेजा... आँखें नम हो गयी... रोये भी हम! परस्पर है यह... अगर मेरे लिखे शब्द और यूँ ही लिखी पंक्तिया वहां संबल बन रहीं थी... तो आपके लिखे पत्र भी कई बार निराशा के अन्धकार से उबारते थे हमको... आज अभी अनुशील पर जो कविता लिखी वो उसी पत्र में मिली न... इस कविता को तो हम बिलकुल भूल चुके थे...! लगता है, पत्र लिखना चाहिए... लिखते रहना चाहिए... इस ई मेल और फेसबुक युग में भी लिखने चाहिए ख़त... कि लिखे हुए शब्दों को सहेजना... उस अपनेपन को सहेजना है जो विलुप्तप्राय है...! अभी अभी लिखते हुए ये ख्याल आ रहा है कि उन सभी को स्टॉकहोम से पोस्टकार्ड्स लिखेंगे जल्द ही जो मेरे अपने हैं... मेरे करीबी...! अपने आप को हर उस जगह पहुँचाना है... जहाँ हम होना चाहते हैं... पर हो नहीं सकते...! राकेश भैया, इस कठिन समय में यूँ  हमें हम तक पहुँचाने का शुक्रिया...

*** *** ***

ललित, आपके लिए 

शब्द नहीं व्यक्त कर सकते कुछ भी...
आज मन भरा भरा सा है...

कुछ कहने की शायद ज़रूरत भी नहीं...
क्यूंकि अंतर्यामी है आप
सब जानते हैं...

बस यूँ ही
प्रकट हो...
हर संकट से
उबारते रहिएगा...

भैया,
यूँ ही हमेशा

सूर्य सा दमकते चमचमाते रहिएगा...!!!

*** *** ***

यूँ ही लिखते गए कुछ कुछ... अपने आप को ही समेटने के लिए... बिखरा सा कुछ कुछ तह तो हुआ ही है... जो बचा वो फिर कभी... कि बाकी है ज़िन्दगी तो टूटना बिखरना भी चलेगा... और संवारना  संवरना  भी होता ही रहेगा हर टूटन... हर बिखरन का...!!!

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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