'अनुशील' के पन्ने पलटते हुए!

लिखने के मौसम होते हैं... मन का भी मौसम होता है... वसंत, ग्रीष्म, पतझड़ एवं शीत के मौसम आते हैं, बीत जाते हैं. पर शायद मन के मौसम का कुछ अलग ही गणित  होता है, अनगिनत होते हैं मन के मौसम या फिर मात्र दो ही जिनके बीच झूलते हुए हम अनगिनत भावों से गुजरते हैं… अनगिनत रंग जीते हैं!
मन का मौसम लेखन को भी प्रभावित तो करता ही है, आखिर कहते भले हों कि लिखती कलम है, पर मूलतः लिखा तो मन से ही जाता है…
जो मन को छू जाए वही होता है हमारे लेखन का आधार भी, विषय भी और मंजिल भी…

***

मेरी यात्रा जब अनुशील पर शुरू हुई थी तब नहीं जानते थे कि कब तक चलेगी यह…  लौट भी आएगी रूठी कवितायेँ मेरे यहाँ या नहीं होगा उनका आना कभी भी?
अपनी पुरानी  कविता दोहराते हुए हमने यहाँ लिखना शुरू किया था, फिर धीरे धीरे ये यात्रा आगे बढ़ती रही, कभी लगातार लिखा, कभी बिलकुल छोड़ भी दिया… पर कविता और यात्रा हमेशा आवाज़ देते रहे और हम लौटते भी रहे, एक मौन के बाद… एक अन्तराल के बाद!
कोई यूँ बिना बताये बस चल दे तो कौन नाराज़ नहीं होगा! पर कवितायेँ कभी नहीं हुईं नाराज़, यात्रा ने मेरा साथ कभी नहीं छोड़ा… कवितायेँ जुड़ी ही रहीं हमसे, हमारे आंसू भी पोंछे, हमें राह भी दिखाई और कविता ने हमें हमारी सारी धृष्टताओं के लिए सहर्ष क्षमादान भी दिया…

***

रोज़ नहीं होता
सूर्योदय
इतना सुन्दर,
या शायद रोज़
हमें ही नहीं होती
इतनी फुर्सत
कि निहारें उसे!
वरना,
सूरज तो हर रोज़
उतनी ही सुन्दरता से
उगता है!


रोज़ नहीं चहकती
इतने सुर में
चिड़ियाँ,
या शायद
हमें ही नहीं हो पाती
सुरों की पहचान
अप्राकृत आवाज़ों के शोर में!
वरना,
प्रकृति में
सुर-संगीत का दौर तो
अहर्निश चलता रहता है!


रोज़ नहीं कुरेदती
इस कदर
उदासी,
या शायद
उस एहसास को भुला पाने में
अक्सर हो जाते हैं
कामयाब हम!
वरना,
दर्द का दरिया तो
हर पल
भीतर बहता है!


एक है छवि
अपनी सी
दिव्य व स्नेहमयी,
होता सामर्थ्य-
तो तोड़ लाते उसकी ख़ातिर
चाँद और तारे!
सुना है, 

"प्रार्थना में बड़ी ताकत होती है"
बस, उसकी खुशियों के लिए
हृदय पल-पल
प्रार्थनारत रहता है!

***

कविता का क्षेत्र जितना विशाल होता है, उतना ही विशाल है उनका हृदय; कविता जितनी स्नेहमयी होती है, उतने ही स्नेहपूर्ण हैं वो; कविता जितनी अपनी है, उतनी ही अपनी है उनकी दिव्य छवि!
हैप्पी बर्थडे, भैया!

15 टिप्पणियाँ:

yashoda Agrawal 16 अगस्त 2013 को 3:20 am बजे  

आपने लिखा....हमने पढ़ा....
और लोग भी पढ़ें; ...इसलिए शनिवार 17/08/2013 को
http://nayi-purani-halchal.blogspot.in
पर लिंक की जाएगी.... आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....
लिंक में आपका स्वागत है ..........धन्यवाद!

महेन्द्र श्रीवास्तव 16 अगस्त 2013 को 5:34 am बजे  

बात तो सही है,
अच्छी रचना
बहुत सुंदर

Anita 16 अगस्त 2013 को 10:56 am बजे  

उस एहसास को भुला पाने में
अक्सर हो जाते हैं
कामयाब हम!
वरना,
दर्द का दरिया तो
हर पल
भीतर बहता है!
सचमुच भीतर एक दरिया है..जो अनवरत बहता है...शायद वही आगे बढने को प्रेरित भी करता है..

धीरेन्द्र अस्थाना 16 अगस्त 2013 को 1:44 pm बजे  

रोज़ नहीं कुरेदती
इस कदर
उदासी,
या शायद
उस एहसास को भुला पाने में
अक्सर हो जाते हैं
कामयाब हम!

बहुत कुछ हमने भुला देना ही होता है

नवीन रचना :
अन्तर्गगन: १५ अगस्त -२०१३ : एक और कैलेंडर !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 16 अगस्त 2013 को 5:33 pm बजे  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी का लिंक कल शनिवार (17-08-2013) को "राम राज्य स्थापित हो पाएगा" (शनिवारीय चर्चा मंच-अंकः1339) पर भी होगा!
स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...!
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

अशोक सलूजा 17 अगस्त 2013 को 5:13 am बजे  

दिल के अहसास साझा किये आपने ...और सच किये ..बस येही जीवन है ...
आपके भैया को मेरी तरफ से भी मुबारक और शुभकामनायें!

Darshan jangra 17 अगस्त 2013 को 6:25 am बजे  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...

ओंकारनाथ मिश्र 17 अगस्त 2013 को 6:51 am बजे  

यह बात तो सच है कि कविता का साथ रहता है तो ह्रदय हल्का रहता है.

Prakash Jain 17 अगस्त 2013 को 7:19 am बजे  

Behtareen...

Anupama Tripathi 17 अगस्त 2013 को 8:36 am बजे  

कितनी सुंदर रचना से भाई के लिए की प्रार्थना ...!!हमारी भी आवाज़ और शब्द ....(क्योंकि मुझे तुम्हारे शब्द अपने ही लगते हैं )....:))...शामिल है इसमे अनुपमा ....!!

प्रवीण पाण्डेय 17 अगस्त 2013 को 10:56 am बजे  

हमारी ओर से भी शुभकामनायें..

Maheshwari kaneri 17 अगस्त 2013 को 11:25 am बजे  

सच में कविता हमारा जीवन है.

Kailash Sharma 17 अगस्त 2013 को 11:59 am बजे  

उस एहसास को भुला पाने में
अक्सर हो जाते हैं
कामयाब हम!
वरना,
दर्द का दरिया तो
हर पल
भीतर बहता है!

....अंतस के भावों को बहुत ख़ूबसूरत शब्द दिये हैं आपने...दिल को छूती बहुत सुन्दर प्रस्तुति...

कालीपद "प्रसाद" 17 अगस्त 2013 को 7:26 pm बजे  

अच्छी रचना ,शुभकामनाएं
latest os मैं हूँ भारतवासी।
latest post नेता उवाच !!!

आहुति 18 अगस्त 2013 को 5:35 am बजे  

behtreen abhivaykti....

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कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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