कल जो फूलों की सन्निधि एवं पीपल की छाँव के विषय में लिखा तो कुछ कुछ उनके निकट होने के भाव को जीया भी.
आज सुबह जो आँखें खुलीं और हम अपनी खिड़की के पास बैठे तो कुछ ठंढक महसूस हुई. इस बार गर्मी का मौसम कुछ ज्यादा ही सुहावना रहा यहाँ, धूप ने खूब दर्शण दिये, सूर्य देवता खूब मुस्कराए सागर किनारे! लेकिन अब मौसम बदल रहा है, बादल हैं, कुछ बारिशें हैं और मेरी खिड़की पर खड़ा एक गमला है… जिसे कल ही हमने हवा और धूप से बातें करने को खिड़की पर रखा है! अभी जो देखा तो सूर्य की स्निग्ध किरणों में मेरा गमला बड़ा खुश लगा, सिकुड़ आई पत्तियों को जैसे हवा ने सहला कर दुरुस्त कर दिया था… बस मन नहीं हुआ कि खिड़की के पल्ले लगा कर गमले से उसकी मुस्कान छीन लें, सो बस ओढ़ ली है हमने एक शाल और अब हम दोनों खुश हैं, गमला भी और हम भी!
बचपन के दिनों में और जब तक साथ रहना हुआ हम चारों भाई बहन सुबह के सूर्य का स्वागत पापा के साथ छत पर से किया करते थे, मंत्रोच्चारण के साथ फिर सभी अपने से बड़ों के पाँव छूते थे! मेरे सबसे छोटे भाई को सबसे ज्यादा बार झुकना होता था चरणस्पर्श करने को पर प्यार और आशीष भी तो सबसे ज्यादा उसके हिस्से में ही आते थे!
आज जब सभी अलग अलग जगहों पर हैं, जीवन ने दिनचर्या बदल दी है, होस्टल के जीवन ने सबके सोने जागने के समय में मूल चूल परिवर्तन कर दिया है, तब भी हमें विश्वास है, सूर्य दर्शण पर हममें से हर कोई मंत्रोच्चारण करता ही होगा और मन ही मन मात-पिता के चरणस्पर्श भी! देखते हैं, मम्मी पापा के पास हम चारों भाई-बहन एक साथ कब इकट्ठे होते हैं? फिर जियेंगे वो क्षण जिसकी स्मृति ने अभी हमें पकड़ रखा है!
भगवान भास्कर के नाम का उच्चारण मन में चल रहा है- ॐ सूर्याय नमः ॐ भानवे नमः ॐ रवये नमः ॐ दिवस्पतय नमः ॐ खगय नमः ॐ पुष्णे नमः ॐ तेज्पूंजाय नमः ॐ जगतचक्षेसु नमः ॐ जगत जीवनाय नमः ॐ हिरण्यगर्भाय नमः ॐ मारिचाये नमः ॐ आदित्याय नमः ॐ सावित्रे नमः ॐ अर्काय नमः ॐ भास्कराय नमः ॐ आरोग्यं इच्छेतु भास्करात ॐ ज्ञानं इच्छेतु शंकरात…
सूर्यदेव की प्रार्थना के साथ अपने घर जमशेदपुर पहुँच गए हम मन ही मन, मम्मी को फ़ोन भी कर लिया, आँखें भी नम हो गयीं, अब क्या अब जो लिखने लगे ही हैं तो मन को जरा वहाँ से हटाने में… मन को भुलाने में कुछ सफलता मिल ही जायेगी!
बेहद शांति है, मन को कहीं और लगाना ही है तो उप्साला के यात्रावृतांत को ही आगे बढाया जाए! अजनबी शहर में पीपल की छाँव से निकल कर अब हम चलते है पुनः २० मई २०१२ वाले दिन तक और आज स्मृतियों से ढूंढ निकालते हैं उप्साला के प्राचीन शहर को उसकी पौराणिक विशेषताओं एवं मनभावन गलियों के साथ!
शुरू से शुरू करते हैं… उप्साला पहुँचते ही ओल्ड टाउन के लिए बस पर सवार होकर निकले हम, हाथों में मानचित्र और उसे इन्टरप्रेट करने के प्रयासों के साथ. पूरे बस में केवल हम दो ही यात्री थे और बस अपने गंतव्य की ओर बढ़ी जा रही थी, बस चालक की मदद से हमें यह स्पष्ट हो गया था कि किस स्टॉप पर उतरना है, उस भलेमानुष ने स्टॉप से आगे कैसे बढ़ना है, इस विषय में भी थोड़ी जानकारी दे दी थी इसलिए कुछ और सहुलियत हो गयी! हम आश्वस्त हुए कि शुरुआत तो बहुत अच्छी हुई है, दिन भी अच्छा ही रहेगा!
अब हम पुराने उप्साला की धरती पर थे. इतिहास, संस्कृति एवं सौन्दर्य से समृद्ध यह इलाका स्कैनडनेविया का सबसे बड़ा अंत्येष्टि स्थल भी है!
उप्साला शहर का यह भाग इस सन्दर्भ में सबसे जुदा है कि यह महान ऐतिहासिक महत्त्व का एक बिन्दु होने के साथ ही साथ प्रकृति संरक्षण का भी अनूठा केंद्र है!
स्वीडन के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण भाग में चलना था ओल्ड टाउन की धरती पर चलना. लौह युग के अंत्येष्टि स्थल, बारहवीं शताब्दी में निर्मित एक मध्यकालीन गिरिजाघर, और छठी शताब्दी के तीन भव्य टीले शाही कब्रिस्तान के! इन टीलों से दूर तक का दृश्य देखा जा सकता है, घास से अच्छादित इन हरे भरे टीलों पर चढ़ कर हमने दृश्य का आनंद भी लिया और तसवीरें भी खींचीं!
कहते हैं यहाँ होने मात्र से आप इस स्थल के इतिहास का हिस्सा हो जाते हैं! आखिर शताब्दियों पुरानी जगह में खड़ा होना ही इतिहास को जीने की तरह है!
इसी क्षेत्र में एक म्यूजियम भी है… उन पुराने दिनों को दर्शाता हुआ! यहाँ का इतिहास पढ़ते हुए वाइकिंगस के बारे में कुछ जाना है, उनकी जीवनशैली से सम्बंधित सबकुछ संरक्षित है म्यूजियम में, यह सब देख कर पढ़ी हुई बातें ताज़ा हो गयीं!
म्यूजियम में वह शताब्दियों पुराना माहौल जैसे पुनः सृजित किया गया है, पुरातन चीज़ों के प्रदर्शन से, पुरातात्विक खुदाई से प्राप्त विभिन्न वस्तुओं से!
वाइकिंग्स लोग पढ़ लिख सकते थे और ध्वनि मूल्यों पर आधारित रुणर नामक एक गैर मानकीकृत वर्णमाला का इस्तेमाल किया करते थे. वाइकिंग युग से कागज पर रूण लेखन के कुछ अवशेष मिलते हैं! रूण के शिलालेख भी मिलते हैं जिन्हें आमतौर पर मृतकों की स्मृति में पत्थर पर लिखा जाता था! रुणर का उपयोग लैटिन वर्णमाला के साथ समानांतर प्रयोग में आता रहा १५ वीं शताब्दी तक.
अंत्येष्टि क्रिया की भव्यता को भी उसके पूर्ण वैभव के साथ दर्शाया गया है. नीचे एक नाव में किसी महिला की कब्र है. आलिशान होता था मौत का उत्सव और मृत्युपरांत जीवन की तैयारियां भी. ऐसे ही कई नमूने और थे प्रदर्शित जिनसे हो कर गुजरना मौत और जीवन के किसी संधिक्षेत्र से हो कर गुजरना था!
ऑडियो विडियो भी चल रहा था म्यूजियम के एक कक्ष में, अँधेरे में परदे पर उस युग की कहानी ज्यूँ चल रही थी वहीँ आसपास से अपना युग जैसे लुप्त हो रहा था… हम अब उस समय में थे जहां से इस समय तक की दूरी बहुत बड़ी थी!
ये एहसास होने में विशेष वक़्त नहीं लगा कि हमारे पास वक़्त बहुत कम है और देखे जाने को शेष कई मंज़र क्यूंकि ये तो सफ़र की शुरुआत ही थी! इसलिए हम परदे पर चल रही कहानी को पीछे छोड़ आगे बढे म्यूजियम से चर्च की ओर!
बहुत भव्य एवं पुराना है यह गिरिजाघर, बारहवीं शताब्दी के इस चर्च में कई अद्भुत कलाकृतियाँ देखीं! आल्टर अर्थात वेदी तक जाने वाली राह में जो कालीन बिछी हुई है, उसी ज़मीन के भीतर स्वीडन के प्रसिद्द खगोलशास्त्री अन्दर्स सेल्सिअस विश्रामरत हैं, यह सेल्सिअस परिवार की कब्रगाह है! वहाँ लगे पट पर यह पढ़कर एक बार तो कदम जैसे ठिठक गए, एकदम जाने पहचाने से नाम का इतिहास और जीवन सब समक्ष ही तो थे! सेल्सिअस से परिचय तो उन दिनों तक जाता है जब ७वीं/८वीं में भौतिकी के पाठ में हम सेल्सियस स्केल को फ़ारेनहाइट में कन्वर्ट करते थे! आज जहां खड़े थे वहाँ उस सेल्सिअस की रूह अपने विश्रामगाह में थी और हम इस एहसास और संज्ञान के साथ वहाँ खड़े थे कि इस क्षेत्र में कब्रें ही कब्रें हैं, चर्च के भीतर भी और चर्च के बाहर भी!
तस्वीरों के माध्यम से चर्च के कुछ एक धरोहरों को यहाँ सहेज लें, निश्चित ही इनकी ऐतिहासिकता को याद रख लेना आवश्यक है यात्रा के पड़ाव को रेखांकित कर लेने की दृष्टि से…
यह है आल्टरपीस, इसमें क्रमशः बायें से नज़र आ रहे हैं संत एरिक, संत एस्किल, पीटर, मेरी, जॉन, पॉल, संत ऑलोव, बिशप हेनरिक, बिशप इरेस्मस (संभवतः), संत लियोनार्ड, मेरी मैग्डालेन, संत एलिजाबेथ, संत ब्रिजेट, संत जर्त्रुद, संत बर्नार्ड और संत लार्स.
और यह है बिशप का सिंघासन और शायद स्वीडन का सबसे पुराना फर्नीचर भी!
चर्च में प्रवेश करते ही एक सिल्वर कैबिनेट है, जिसमें बहुत सारी ऐतिहासिक वस्तुएं हैं. इन्हें क्रमशः पहचाना जा सकता है! उसी वक़्त वहाँ से हर वस्तु का समयकाल नोट कर लिया था. आज यहाँ वस्तुओं को उनके नाम और समयकाल के साथ लिख लेते हैं, तस्वीर पढने जैसा कुछ चमत्कार सृजित होगा!
सिल्वर कलश (१६७३), सिल्वर घंटी (१७४४), प्याला (१४ वीं शताब्दी), थाल (१५ वीं शताब्दी), दुल्हन का मुकुट (१८ वीं शताब्दी), थाल (१५ वीं शताब्दी), दुल्हन का मुकुट (१९६५), प्याला, बप्तिस्मल फॉन्ट (१७५० से पूर्व का), पैरिश कपडा (१७५६), धूपदान (१३ वीं शताब्दी) क्रमशः पहले रैक में हैं.
दूसरे रैक में: वेफ़र बॉक्स, मोमबत्तियां एवं आल्टर क्रास, सिल्वर चम्मच (१६९०-१७१८), सिल्वर तस्तरी, वाइन पिचर (१६९२), प्याला (१८६२), वेफर बॉक्स, स्मृति मुहर (१९८९), और इसाई दीक्षा सम्बन्धी जल का कलश (१९९०).
तो इस तरह पुरातन से अपेक्षाकृत नवीन समय तक का पूरा सफ़र है इस कैबिनेट में! आज सभी के विवरण को यहाँ लिख कर अच्छा लग रहा है कि सुरक्षित रह जायेंगे तथ्य यहाँ. इन गुज़रे एक डेढ़ साल तक कागज़ ने पेंसिल की लिखावट संभल कर रखी हुई है, खो भी तो सकती थी, सो आज वह कागज़ भी जैसे अपने दायित्व का निर्वाह कर संतुष्ट और निश्चिंत लग रहा है जब उस पड़ाव को हम अनुशील पर लिख कर हमेशा के लिए सहेज चुके हैं! वैसे ये हमेशा के लिए तो कुछ भी होता नहीं, फिर भी…
अब एक मूर्ती की तस्वीर: सेंट एरिक की यह मूर्ती १३ वीं - १४ वीं शताब्दी से है. सेंट एरिक के नीचे की ताजपोश ट्रोल ताज के लिए बुतपरस्ती और बुतपरस्त दावेदार दोनों का प्रतीक हो सकती है…
आल्टर के करीब एक बच्चे के साथ मडोना की मूर्ती है. यह १५ वीं शताब्दी के समय की है! ममत्व एवं करुणा का प्रतीक बन कर दैदीप्यमान है…
१३ वीं शताब्दी की "ट्रायम्फल क्रॉस" चर्च में बगल की दिवार पर है एवं दूसरी तस्वीर छत से झूलते १५ वीं शताब्दी के ट्रायम्फल क्रॉस की है!
प्रवेश द्वार से बाहर निकलते हुए ये नूतन पुरातन के अनेक विम्ब भी साथ निकले, कब्र की आहटें भी साथ हो लीं कि प्रवेश द्वार के बाहर भी तो कब्रगाह ही था, विश्रामरत रूहों का निवास स्थल.
स्वीडिश कविताओं का अनुवाद करते हुए मौत एवं कब्रगाह से सम्बंधित कई कविताओं से गुज़रे हैं, यहाँ से निकलते हुए याद आती है कवि इंग्रिद काल्लेनबेक की एक कविता की पंक्तियाँ: :
"मृत्यु है मात्र
जीवन की पुनरावृति."
सच, जीवन और मृत्यु के संधिस्थल सा ही तो कुछ दृश्य है, हर तरफ पसरी खामोशी और इसी ख़ामोशी के बीच गूंजता जीवन आगंतुकों की चहल पहल में! इस जगह को यूँ सहेज कर रखा गया है मानों सचमुच एक कविता ही हो मौत और एक उत्सव ही हो मृत्युपरांत जीवन!
यहाँ से निकले तो इतिहास कई मायनों में परीचित सा लग रहा था, बीती शताब्दियों की गूँज जैसे सुन पा रहे थे हम!
अलविदा, ओल्ड टाउन! बहुत कुछ शेष रह गया, पर अभी मन कुछ भरा भरा सा है, अब तुम्हारी हरियाली और रास्ते को कभी और देखेंगे… कभी और आयेंगे तुम्हारे पास तुम्हें जीने…!
अब स्टॉकहोम से कहाँ अधिक दूर है उप्साला, दोबारे आया तो जा ही सकता है न!
आपने सुंदर फोटो दिखाए जेसेअपनी यात्रा में दर्शक/पाठक को भी शामिल कर लिया "मृत्यु है मात्र जीवन की पुनरावृति."...इसने हज़रत फानी याद दिलाये ,,मर के कहीं टूटा है सिलसिला केदे हयात सिर्फ इतना है ज़ंजीर बदल जाती है
अब तुम्हारी हरियाली और रास्ते को कभी और देखेंगे… कभी और आयेंगे तुम्हारे पास तुम्हें जीने…! अब स्टॉकहोम से कहाँ अधिक दूर है उप्साला, दोबारे आया तो जा ही सकता है न! बहुत उपयोगी यात्रा संस्मरण आपके अनुपमा ....!!कोई भी अगर स्वीडन जाएगा उसके लिए बड़ी महत्वपूर्ण जानकारी भी है इसमें....और साथ है आपका स्वीडन का मनोहारी वर्णन ... बहुत सुंदर आलेख .
9 टिप्पणियाँ:
मेरा मन भी भरा भरा हो गया चित्रों द्वारा यत्रा कराने के लिए शुक्रिया
क्या कहूँ...शुक्रिया तो कह ही सकती हूँ....
impressive post!!
thanks a ton...
anu
बढ़िया तस्वीरें… बहुत अच्छी तरह सहेजा है आपने इन्हें जानकारियों के साथ …. शुक्रिया
आपने सुंदर फोटो दिखाए जेसेअपनी यात्रा में दर्शक/पाठक को भी शामिल कर लिया "मृत्यु है मात्र
जीवन की पुनरावृति."...इसने हज़रत फानी याद दिलाये ,,मर के कहीं टूटा है सिलसिला केदे हयात सिर्फ इतना है ज़ंजीर बदल जाती है
आपकी शैली अनोखी है..बहुत मन से सहेजा है अपने चित्रों को और उनसे जुड़े विवरण को..बचपन की स्मृतियों को भी ताजा करती हुई पोस्ट के लिए बधाई !
अपनी इस यात्रा में शामिल कराने के लिए एक बार फिर से धन्यवाद!!
अब तुम्हारी हरियाली और रास्ते को कभी और देखेंगे… कभी और आयेंगे तुम्हारे पास तुम्हें जीने…!
अब स्टॉकहोम से कहाँ अधिक दूर है उप्साला, दोबारे आया तो जा ही सकता है न!
बहुत उपयोगी यात्रा संस्मरण आपके अनुपमा ....!!कोई भी अगर स्वीडन जाएगा उसके लिए बड़ी महत्वपूर्ण जानकारी भी है इसमें....और साथ है आपका स्वीडन का मनोहारी वर्णन ...
बहुत सुंदर आलेख .
चित्रमय खुबसूरत प्रस्तुती......
"तस्वीरें बोलती है " सचमुच आपकी तस्वीर्वं बोल रही है
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