कार्ल लीनियस का शहर!

उप्साला... कार्ल लीनियस का शहर... इस महान जीव विज्ञानी की धरोहर को सहेजे हुए यह शहर विशिष्ट रूप से स्मृति में अंकित हो गया...! बहुत सुन्दर अनुभव रही उप्साला यात्रा, एक बार पुनः जाने की इच्छा लिए जब हम लौटे तो बहुत सारे भाव थे, बहुत सारे तथ्य थे जो मुझे अपने लिए लिख कर सहेज लेने का मन था, कुछ लिखा भी था पर पूर्ण नहीं कर पायी और देखते देखते तारीख २० मई से बदलते हुए आज १० जुलाई हो आई... आज सब समेट कर बैठी हूँ यात्रा की यात्रा पर निकलने को... सब सिलसिलेवार लिख कर सहेजने को, सबों से बांटने को...!
तो शुरू करते हैं यात्रा...
स्टॉकहोम से करीब ७० किलोमीटर की दूरी पर स्थित है उप्साला. हम सुबह बस से निकले और दस बजे तक वहाँ पहुंचे. एक ही दिन का समय लेकर निकले थे, रात को वापस आ जाना था. जाते हुए बस में ढ़ेर सारी सूचनाओं, मानचित्र, जगहों के विषय में पढ़ते हुए जा रहे थे कि नयी जगह पर क्या क्या देखना है, कहाँ कहाँ जाना है और कैसे जाना है.

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आज यह टुकड़ा ड्राफ्ट्स में मिला, पढ़ा तो अहसास हुआ २० मई २०१२ को की गयी यात्रा को सहेजना हो ही नहीं पाया… १० जुलाई २०१२ को ऊपर वाला टुकड़ा लिखा ज़रूर पर पूरा नहीं कर पाये. आज ८ अगस्त २०१३ है, कितना वक़्त बीत गया उस यात्रा को पर लिखने लगें तो लिख जायेंगे अक्षरशः उस यात्रा के पड़ावों को, ऐसा ही कुछ लग रहा है अभी! तो कार्ल लीनियस के शहर की यात्रा इस पोस्ट में उन्ही के घर से प्रारंभ करते हैं, भले ही हमारी यात्रा में यह अंतिम पड़ाव था! 

हम काफी हड़बड़ी में पहुंचे थे लीनियस उद्यान कि कहीं बंद होने का वक़्त न हो जाए हमारे पहुँचते तक. लेकिन ईश्वर कृपा से जब पहुंचे तो ठीक कुछ पैंतालिस मिनट का समय बचा था म्यूजियम बंद होने में, सो हमारा वहाँ समय से पहुँचने का मिशन सफल रहा. 

हम एक ऐतिहासिक शहर की सभी गलियों में घूम कर, कई स्थलों से होकर अब उस स्थान पर थे, जहां आने के लिए ही शायद हमने उप्साला की एकदिवसीय ट्रिप प्लान की थी. 


उद्यान में स्थित लीनियस म्यूजियम १७४३ से १७७८ तक लीनियस का घर था. उनके जीवन काल में यह ईमारत प्राकृतिक इतिहास और चिकित्सा के क्षेत्र में अनुसन्धान के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय केंद्र थी. उन्होंने जीवनपर्यन्त साथी वैज्ञानिकों से गहन संपर्क बनाये रखा और इसी स्थल से उन्होंने अपने शोधकार्य से विद्यार्थियों की एक पूरी पीढ़ी को प्रेरित किया…! उद्यान की तरफ खुलने वाली उनके अध्ययन  कक्ष की खिड़की इस बात की गवाह बनकर आजतक यथावत खुली है सूर्य की किरणों के लिए, हवा के झोकों के लिए, फूलों की सुगंध के लिए…!


घर की दूसरी मंजिल पर स्थित सुन्दर पुस्तकालय और लेक्चर हॉल में जाकर हर एक दस्तावेज़ को ध्यान से देखना कितना अभिभूत करने वाला अनुभव था, यह कह पाने को शब्द नहीं हैं!



धरोहर को जब यूँ संभाल कर रखा जाता है, इतना मान दिया जाता है तब बनता है कोई शहर प्राणवान…! 


बोटानिकल नाम रटते हुए, पौधों की फैमिलीज़ को पहचानने का अभ्यास करना, हर्बेरियम बनाने के लिए वो ग्रेजुएशन में किया गया श्रम… सब याद आ गए, उस स्थल पर खड़े होकर. वनस्पतिविज्ञान की इस छात्रा ने शायद ही कभी कल्पना की थी कि वह एक रोज़ मॉडर्न टेक्सॉनॉमी के जनक के घर में खड़ी होगी! निश्चित ही अभिभूत करने वाले क्षण थे. ज़िन्दगी सचमुच कई सुखद संभावनाओं को साथ लिए चलती है…!विस्मयकारी भी है, कठिन तो है ही पर सुन्दर भी है जीवन की डगर!


दोमंजिली वह ईमारत शान से खड़ी है धरोहर बन कर. सहेजा हुआ सबकुछ अपने आप में एक गाथा है!

नीचे की मंजिल परिश्रमी श्रीमती लीनियस और उनके पांच बच्चों का निवास था. आज घर संग्रहालय में बदल चुका है एवं मूल रूप से परिवार से सम्बद्ध प्रदर्शनियों और वस्तुओं के माध्यम से उप्साला में लीनियस के जीवन का सक्षमता से वर्णन करता है. 


ऊपर संग्रहित वस्तुओं के चित्र हैं. अब चलते हैं रसोई की ओर… श्रीमती लीनियस की रसोई जैसे अपने ही यहाँ के कुछ दृश्यों को सजीव करती हुई सी लगी. आसान नहीं था श्रीमती लीनियस होना! (ऐसा वहाँ रसोई में लिखा हुआ था) आने जाने वालों की मेहमाननवाज़ी में उनका विशेष श्रम लगता था, भोजन की व्यवस्था भी वे स्वयं ही देखती थीं.


श्रीमती लीनियस के कमरे की भी बहुत सारी तसवीरें ली थीं हमनें, उन्ही में से एक यह… पर बहुत स्पष्ट नहीं आ पाया है. यह अपनी पत्नी सारा एलिजाबेथ मोरेअ को लीनियस द्वारा लिखित पत्र है, जिसमें उन्होंने एक कविता लिखी है!


यह पत्र कमरे की दिवार के पास स्थित अलमारी के नीचे खाने में था…! सबसे ऊपर वाले खाने में सारा लीनियस की hymn बुक है और उसके ऊपर पड़ा है उनका गोल ऐनक वाला चश्मा… इस तस्वीर में स्पष्ट तो नहीं ही दिखेगा, दूसरी वाली में शायद कुछ कुछ स्पष्ट है!





ऐसी ही बहुत सारी छोटी छोटी उल्लेखनीय चीज़ें हैं हर कमरे में, सबको समेटना चाहते थे, सबके विषय में पढना चाहते थे पर समय सीमा तय थी सो न मन भर तसवीरें ले सके न हर तथ्य को ही पढ़ सके! 

खैर, यात्राएं तो यूँ ही होती हैं… कहीं कुछ छूटता ही  है, पर संतोष है क्यूंकि यह आशा है कि फिर कभी पुनः यहाँ आना अवश्य होगा निकट भविष्य में!

अब उद्यान में भी बहुत कुछ था देखने को लेकिन समय न होने के कारण एक आध तसवीरें ही क्लिक कर पाये…!

फूलों की क्यारियां मुस्कुरा रहीं थीं मानों कह रही हों: सोच कर तो जा रहे हो, देखते हैं कभी आ पाते भी हो पुनः या नहीं!


श्वेत श्याम अपने आप में सबसे सुनहरे रंग हैं, एक सहज सरल सा आकर्षण होता है उनमें. बर्फीले मौसम में जब सारा माहौल ही श्वेत श्याम हो जाता है, तो यह चमत्कार कई बार अनुभव किया है हमने!

रंग थे चारों ओर पर श्वेतश्याम सा कुछ चमत्कारी अनुभव कर रहा था मन, दिन भर का थका हारा था, पर उत्साह नहीं था कम! तभी तो मन ही मन उन क्यारियों को हमने जवाब भी दिया था: देखना, आयेंगे ज़रूर! उन्ही क्यारियों में से एक में खिले एक फूल ने हंस कर हमारे जवाब का स्वागत किया था. उसी पीली मुस्कान की तस्वीर हमने पोस्ट के शुरूआत में लगा रखी है…! 


अंतिम पड़ाव से लिखना शुरू किया है, यात्रा की स्मृतियों से अन्य पड़ावों की भी तस्वीर एवं दास्तानें सहेज लेंगे इस बार, पुनः व्यस्त हो जाने से पहले! 

देखते हैं यह मन की बात कितना मूर्तरूप ले पाती है! 

9 टिप्पणियाँ:

Yashwant R. B. Mathur 8 अगस्त 2013 को 4:10 pm बजे  

कार्ल लीनियस और उनके घर व शहर के बारे मे लिखे इस यात्रा वृतांत को पढ़ कर लगा ही नहीं कि आप 1 वर्ष पहले वहाँ गयी थीं।
सपनों से देश की इस सुंदर सी जगह के बारे मे जान कर बहुत अच्छा लगा। इस पोस्ट का लिंक दोबारा भी पढ़ने के लिए सहेज लिया है। आशा है इस यात्रा के और पड़ावों के बारे में आपकी अगली पोस्ट जल्द ही पढ़ने को मिलेगी।


सादर

अनुपमा पाठक 8 अगस्त 2013 को 4:16 pm बजे  

Thanks a lot Yashwant ji:)
Hope to write the next post of this series soon!

मनोज पटेल 9 अगस्त 2013 को 4:23 am बजे  

यात्रा वृतांत पढ़ना हमेशा अच्छा लगता है और साथ में तस्वीरें भी हों तो लगता है कि हम भी घर बैठे एक यात्रा कर आए.
आपके लेखक, आपके फोटोग्राफर को ढेर सारी शुभकामनाएँ. अगली कड़ियों की प्रतीक्षा रहेगी...

Anupama Tripathi 9 अगस्त 2013 को 6:41 am बजे  

धरोहर को जब यूँ संभाल कर रखा जाता है, इतना मान दिया जाता है तब बनता है कोई शहर प्राणवान…!
बिलकुल वैसे ही जैसे आपके शब्द इस धरोहर को सम्हाल कर हम तक पहुंचा रहे हैं ....और आपके साथ साथ हमने भी जैसे घूम लिया उप्साला .........और लिनियस का घर बहुत सुंदर लगा ....
अगली कड़ी का इंतज़ार ....:))
शुभकामनायें ।

Onkar 9 अगस्त 2013 को 7:42 am बजे  

सुन्दर यात्रा वृतांत

Ranjana verma 9 अगस्त 2013 को 10:07 am बजे  

सही कहा जब कोई धरोहर को रखा जाता है संभाल कर तब बनता है प्राणवान शहर बहुत अच्छी जानकारी और चित्र भी शुक्रिया !!

Amrita Tanmay 9 अगस्त 2013 को 2:48 pm बजे  

अति सुन्दर ..

प्रवीण पाण्डेय 10 अगस्त 2013 को 7:25 am बजे  

आपकी बाद वाली पोस्ट पहले पढ़ ली, अब मिला पूरा परिचय।

abhi 10 अगस्त 2013 को 8:43 pm बजे  

ये आपने आज कितनी सैर करवा दी हमें....बहुत अच्छा लग रहा है यूँ पढ़ना...तस्वीरें तो बस देखे जा रहे हैं हम...:)

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