अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

कृष्णं वंदे जगद्गुरुम्!

मुझे  क्या  काम दुनिया से मुझे  तो श्रीकृष्ण प्यारा है!
यशोदा  नन्द  का  नंदन  मेरी   आँखों  का  तारा   है!! 

ये पंक्तियाँ गीता प्रेस की किसी पुस्तक में पढ़ी थी बचपन में, हम बहुत गुनगुनाते थे तब इसे... आज भी गुनगुनाते हैं! यशोदा नन्द का नंदन किसकी आँखों का तारा नहीं, किसे नहीं प्यारी मुरली की धुन, कौन नहीं शरणागत है परम शरणागत वत्सल प्रभु का जिन्होंने स्पष्ट कह दिया गीता के १८ वें अध्याय के ६६ वें श्लोक में...

सर्वधर्मान्परित्यज्य   मामेकं     शरणम्    व्रज।
अहम् त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ।६६।

हमें बस शरण में ही तो जाना है,  शेष सबका जिम्मा तो प्रभु ने स्वयं ले ही लिया है! प्रेम भक्ति की धारा में प्रवाहित होते हुए मधुराष्टकं के माधुर्य में मन प्राण को सराबोर कर देना है, प्रभु की विराट छवि का स्मरण करना है, उनकी बाल लीलाओं का आनंद लेना है, वस्तुतः कृष्णप्रेम की ओर मन की चंचलता को मोड़ देना है!

                                  

आज जन्माष्टमी है! जाने कैसे मनाएंगे हम यहाँ प्रभु का जन्मदिन आज. शायद यह शब्द यात्रा ही जन्मोत्सव मनाने का सर्वोत्कृष्ट साधन है यहाँ, बचपन के दिनों से कृष्णाष्टमी की यादें लिख जाना उसी उत्सव में शामिल हो जाने जैसा है जो हमेशा से मन प्राण का हिस्सा रहा है. जमशेदपुर राधेकृष्ण मंदिर में जन्मोत्सव में शामिल होना कितना अच्छा लगता था, झांकियां सजती थी, राधे कृष्ण का भेष धरते थे बच्चे, रात्रि बारह बजे तक गीता पाठ, भजन कीर्तन चलता था. याद है कई बार पापा के साथ हमलोग भी रुक जाते थे और जन्मोत्सव के बाद साथ ही लौटते थे. आज भी पापा जायेंगे उसी मंदिर में, पाठ होगा, भजन कीर्तन से गूंजेगा मन का आँगन, ये सिलसिला तब से अबतक चला आ रहा है, बस रात को जब प्रसाद लेकर लौटेंगे पापा तब हम वहाँ नहीं होंगे प्रसाद पाने के लिए! इतना ही अंतर है नहीं तो जन्माष्टमी अब भी वैसे ही मनती है! 
बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की जन्माष्टमी भी याद आती है, सचमुच महोत्सव की तरह मनता था यह दिन, आज भी मनता होगा उसी उत्साह के साथ. सभी छात्रावास खूब सजे होते थे, राधे कृष्ण झूला झूल रहे होते थे प्रांगन में, खूब झांकियां सजती थी, हम लोग इस हॉस्टल से उस हॉस्टल पूरे बी एच यु कैंपस में देर रात आते जाते रहते थे. एम.एम.वी. छात्रावास से त्रिवेणी छात्रावास तक आना जाना लगा रहता था! दिव्य छटा होती थी उस दिन, नीरस सा हॉस्टल हमारा भक्तिधाम बन जाता था… उस वक़्त की तस्वीरें मन में बसी हैं! आज भी कृष्णजन्म वैसे ही मनाया जाता होगा वहाँ, बस हम नहीं हैं उत्सव में शामिल होने को. 
इन चार वर्षों में स्टॉकहोम में एक बार हम गए हैं कृष्णमंदिर. जहां हम रहते हैं, वहाँ से काफी दूर है. जिस दिन गए थे उस दिन भजन कीर्तन की बारिश में खूब भींगे थे और लौटते वक़्त पेड़ के नीचे खड़े हो बस की प्रतीक्षा करते हुए बूंदों की बारिश ने भी खूब भिगाया था. ये यहाँ का कृष्ण मंदिर और वहाँ हमारा जाना… ये हमें यह जमशेदपुर और  बनारस के संस्मरण लिखते हुए अभी ही याद आया… ओह! जैसे प्रभु कह रहे हों- "कहाँ नहीं हूँ मैं, यहाँ भी हूँ, तुमने यहाँ भी मेरे दर्शन किये हैं और तुम्हारी यहाँ से की गयी प्रार्थनाएं भी मैं सुनता हूँ!" 
प्रभु! हमारी प्रार्थना सुन रहे हो न? 

आत्मविश्वास की वह धारा निकले, जिससे ब्रह्माण्ड प्रकाशित हो जाए
थोड़ा तो कमाल दिखा प्रभु...
ये कलयुग कबसे बैठा है तेरी दयालुता पर नज़र टिकाये!

हमें अनन्य भक्ति प्रदान करो प्रभु, अपनी लीलाओं में रम जाने की करुण मनःस्थिति प्रदान करो, ले लो हमें शरण में!
हमारी मौन प्रार्थनाओं में बस जाओ कि हम तर जाएँ!

13 टिप्पणियाँ:

प्रवीण पाण्डेय 28 अगस्त 2013 को 6:10 am  

कान्हा तो हम सबका प्यारा..

राजेंद्र कुमार 28 अगस्त 2013 को 7:25 am  

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें,सादर !!

Amrita Tanmay 28 अगस्त 2013 को 8:06 am  

बस शरण में ले ले प्रभु..

Kaushal Lal 28 अगस्त 2013 को 10:30 am  

ईश्वरः परम: कृष्ण: सच्चिदानंद विग्रह:

देवेन्द्र पाण्डेय 28 अगस्त 2013 को 12:46 pm  

जै श्री कृष्ण।

महिला महाविद्यालय में आज भी वैसे ही सजती है जन्माष्टमी की झाँकी।

vibha rani Shrivastava 28 अगस्त 2013 को 1:44 pm  

श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनायें

दिगम्बर नासवा 28 अगस्त 2013 को 2:49 pm  

प्रभू की माया है ... उसमें ही तो सब कुछ पाया है ...
बधाई श्री कृष्ण जन्माष्टमी की ...

Darshan jangra 28 अगस्त 2013 को 5:17 pm  

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें,

दिलबाग विर्क 28 अगस्त 2013 को 6:23 pm  

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 29-08-2013 को चर्चा मंच पर है
कृपया पधारें
धन्यवाद

Darshan jangra 28 अगस्त 2013 को 8:46 pm  

कृष्ण जन्माष्टमी की बहुत बहुत शुभकामनायें

हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः8

निहार रंजन 29 अगस्त 2013 को 3:17 am  

कृष्णाष्टमी की यादों को साझा कर आपने मेरे स्मृति तंतुओं में हलचल पैदा कर दी. मेरे गाँव में कृष्णाष्टमी का मेला सबसे बड़ा होता है. इसलिए बचपन में बहुत इंतज़ार रहा करता था इस मेले का. घर के बड़े बुजुर्गो से मेला देखने के पैसे भी मिलते थे. उसका भी अलग आनंद था. और इस दिन पान खाने का लाइसेंस भी मिला होता घर से. इसलिए हर बार चौरसिया पान भण्डार का चक्कर लगा आते थे. दो दिन बहुत उल्लास रहा करता था.

मदन मोहन सक्सेना 29 अगस्त 2013 को 7:45 am  

बहुत खूब , शब्दों की जीवंत भावनाएं... सुन्दर चित्रांकन
कभी यहाँ भी पधारें

कालीपद प्रसाद 29 अगस्त 2013 को 12:15 pm  

कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं

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