उदास गए थे, खिल आये!

झिलमिल सागर से मिल आये
उदास गए थे, खिल आये


हम कभी जो भीड़ में 

गुम हो जाते हैं
देखता है मूक निस्पंद खोये हुए
तो पास बुला लेता है,
पढ़ कर मन की सारी बातें
कुछ एक बूंदों की छींटों से
कई दिनों से जागी आँखों को
मीठी नींद सुला देता है!


तट के उबड़ खाबड़ में 

मिलते हैं वो चाँद सितारे
जो किसी झरोखे से दृश्यमान फ़लक पर
नहीं उगते…
कुछ ऐसे भी खग होते हैं:
सारे दाने छोड़
जो औरों के गम के मनके
हैं चुगते… 


रजकणों के सानिध्य में 

तट पर उनसे मिलकर
मन बदल जाता है…
रूका रूका सा जीवन
उनसे लेकर रस्ते की पहचान
कुछ दूर निकल जाता है…


विस्मित हैं-

सागर के पास कितनी प्रगल्भता
कितनी गहराई है!
शब्द मेरे सीमित
छोटा सा दामन मेरा
आँख मेरी भर आई है!


उसके अपने भी तो गम होंगे

पर औरों के भी ले लेता है!
बिन मांगे ही सीपी-मोती-कंचन
कितनी ही सौगातें दे देता है!!


तभी तो-


उदास गए थे, खिल आये

हम झिलमिल सागर से मिल आये!


14 टिप्पणियाँ:

Anupama Tripathi 3 अगस्त 2013 को 9:32 am बजे  

उदास गए थे, खिल आये
हम झिलमिल सागर से मिल आये!

सागर की गहराई में कितना दम है ......आपकी रचना पढ़ कर ...भावों की इस अथाह गहराई में हम भी डूब गए और ले आए ढेर सारी ऊर्जा जो आपकी रचना दे रही है ....!!
बहुत सारगर्भित अभिव्यक्ति ....!!

Anita 3 अगस्त 2013 को 1:38 pm बजे  

सागर के पास कितनी प्रगल्भता
कितनी गहराई है!
शब्द मेरे सीमित
छोटा सा दामन मेरा
आँख मेरी भर आई है!

सागर से मिलकर खुद से मिलना हो जाता है...तभी तो वह इतना भाता है

Asha Joglekar 3 अगस्त 2013 को 3:44 pm बजे  

सागर हो या पर्वत दोनो सुकून ही देते हैं एक की गहराी हमें अचंभे में डाल देती है दूसरे की ऊंचाई । सुंदर प्रस्तुति ।

ANULATA RAJ NAIR 3 अगस्त 2013 को 4:11 pm बजे  

हमें तो सागर सदा से उदास करता रहा है....
अबके देखेंगे आपकी नज़र से.....

बहुत सुन्दर रचना..
अनु

विभा रानी श्रीवास्तव 3 अगस्त 2013 को 5:39 pm बजे  

उसके अपने भी तो गम होंगे
पर औरों के भी ले लेता है!
बिन मांगे ही सीपी-मोती-कंचन
कितनी ही सौगातें दे देता है!!
बहुत सुंदर पोस्ट
आभार आप का
सादर

Anju (Anu) Chaudhary 3 अगस्त 2013 को 7:14 pm बजे  

खूबसूरत रचना के साथ साथ ....शब्द रचना भी उम्दा है

Ranjana verma 3 अगस्त 2013 को 8:31 pm बजे  

प्रकृति से मिली हर चीजे हमें खुशियां ही देती है...
मन में नई चेतना भर देती है
बढ़िया प्रस्तुति !!

प्रतिभा सक्सेना 4 अगस्त 2013 को 2:52 am बजे  

सागर के पास कितनी प्रगल्भता
कितनी गहराई है!
शब्द मेरे सीमित
छोटा सा दामन मेरा
आँख मेरी भर आई है!
- उन अथाह गहराइयों से सब अपने मनोनुकूल कुछ पा लेते हैं!

Amrita Tanmay 4 अगस्त 2013 को 6:50 am बजे  

जिसे नेमत भरी आँखें ही देख पाती है..

Neeraj Neer 4 अगस्त 2013 को 8:38 am बजे  

रजकणों के सानिध्य में
तट पर उनसे मिलकर
मन बदल जाता है…
रूका रूका सा जीवन
उनसे लेकर रस्ते की पहचान
कुछ दूर निकल जाता है…

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

प्रवीण पाण्डेय 4 अगस्त 2013 को 8:43 am बजे  

न जाने कितनी बूँदों को सहारा दिया है सागर ने।

दिगम्बर नासवा 4 अगस्त 2013 को 10:47 am बजे  

सागर की गहराइयों को छूती ... यादों के अनमोल खजाने जुटाती .... बेमिसार रचना है ...

Yashwant R. B. Mathur 4 अगस्त 2013 को 4:01 pm बजे  

कल 05/08/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
धन्यवाद!

Dr. Shorya 5 अगस्त 2013 को 7:19 am बजे  

उसके अपने भी तो गम होंगे
पर औरों के भी ले लेता है!
बिन मांगे ही सीपी-मोती-कंचन
कितनी ही सौगातें दे देता है!!

वाह ,लाजवाब ढेरो शुभकामनाये ,

यहाँ भी पधारे

http://shoryamalik.blogspot.in/2013/08/blog-post_4.html

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