नीरस एवं निराश क्षण में!

ये बात फ़ैल गयी
अफ़वाह की तरह
जीवन हो गया है अब
एक कराह की तरह 


हर मोड़ पर जैसे केवल
हमलावर ही खड़े हैं
रात तो रात दिन भी हो गया
अब अन्धकार की तरह


किस बात पर फक्र करें
किस शय पर नाज़ हो
घर घर नहीं रहा
सज गया बाज़ार की तरह


खुले हुए दरवाज़े
खुली हुई खिड़कियाँ
गूंजता है संगीत कोई
कातर आह की तरह


मन मेरा उदास है
खोया है बहुत रोया है
रंग क्यूँ लग रहे है सब आज
सफ़ेद और स्याह की तरह


क्यूँ नहीं खिलती कली कोई
किसी मासूम चाह की तरह
जीवन क्यूँ लगता है बस
एक कराह की तरह!

8 टिप्पणियाँ:

अशोक सलूजा 24 अगस्त 2013 को 6:49 am बजे  

अनु जी ...कली भी खिलेगी ,फूल भी बनेगा
जब न मुकरेगा कोई झूठे गवाह की तरह .....
शुभकामनाये !
स्वस्थ रहें!

विभा रानी श्रीवास्तव 24 अगस्त 2013 को 9:36 am बजे  

ये क्या हो गया ...।
चहकती चिड़िया का
चहकना खो गया ...।
वाह-वाह कैसे लिखूँ
हार्दिक शुभकामनायें

Yashwant R. B. Mathur 24 अगस्त 2013 को 9:42 am बजे  

किस बात पर फक्र करें
किस शय पर नाज़ हो
घर घर नहीं रहा
सज गया बाज़ार की तरह

लाजवाब!


सादर

कौशल लाल 24 अगस्त 2013 को 10:40 am बजे  

रात तो रात दिन भी हो गया
अब अन्धकार की तरह
कल का सूरज अवश्य चमकेगा

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार 24 अगस्त 2013 को 12:06 pm बजे  



किस बात पर फक्र करें
किस शय पर नाज़ हो
घर घर नहीं रहा
सज गया बाज़ार की तरह

खुले हुए दरवाज़े
खुली हुई खिड़कियाँ
गूंजता है संगीत कोई
कातर आह की तरह

बहुत पीड़ा उपजाने वाली रचना है...

आदरणीया अनुपमा पाठक जी
आपकी रचना से मन उदास हो गया...
शब्दों की सामर्थ्य को प्रणाम !


समस्त् त्यौंहारों की मंगलकामनाओं सहित...
-राजेन्द्र स्वर्णकार

प्रवीण पाण्डेय 24 अगस्त 2013 को 3:00 pm बजे  

गहरे भाव कहती कविता।

शिवनाथ कुमार 24 अगस्त 2013 को 3:51 pm बजे  

नीरसता और निराशा कभी कभी परिस्थितिजन्य होती हैं
जितना जल्दी यह दूर हो उतना अच्छा

संजय भास्‍कर 25 अगस्त 2013 को 11:25 am बजे  

क्यूँ नहीं खिलती कली कोई
किसी मासूम चाह की तरह
जीवन क्यूँ लगता है बस
एक कराह की तरह!

............गहरे भाव कहती कविता।
फुर्सत मिले तो शब्दों की मुस्कुराहट पर ज़रूर आईये

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कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
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