स्वप्न से स्मृति तक पर कृष्ण प्रेम और ललित प्रेम शीर्षक कविता पढ़ना
ऐसा था जैसे अपने भीतर से ही बहुत कुछ ढूंढ़ निकालने की यात्रा पर चल देना...
कृष्ण प्रेम था ललित बहुत
पर ललित प्रेम है कृष्ण नहीं
कविता की इन
पंक्तियों पर मन अटक कर रह जाता... और इस भिन्नता में अभिन्नता तलाशने में सकल भाव
जुट जाते...!
हृदय से खोजो तो क्या नहीं मिलता... अपने आप को निरुत्तर करने के लिए
लिखी थी एक कविता... और बहुत ख़ुशी हुई थी लिख कर... आज पुनः पोस्ट कर रहे हैं रक्षा बंधन के शुभ अवसर पर…
इस कविता की प्रेरणा बनने के लिए स्वप्न से स्मृति तक की कविता और ललित भैया का आभार!
इस कविता की प्रेरणा बनने के लिए स्वप्न से स्मृति तक की कविता और ललित भैया का आभार!

12 टिप्पणियाँ:
बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा आज { बुधवार}{21/08/2013} को
चाहत ही चाहत हो चारों ओर हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः3 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया पधारें, सादर .... Darshan jangra
hindiblogsamuh.blogspot.com
इस अक्षत अखंड और अटूट बंधन को स्नेहिल ,कीर्तिवान और आत्मिक शब्दों के धागे में देखकर मन अतिशय प्रसन्न हुआ. काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का प्रांगन स्मृतियों के केंद्र में रहता है .
और माँ भी नहीं हो सकती थी
हर गम की साझेदार,
इसलिए
दुनिया में अवतरित हुए भाई!!
नवीन अनुभूति
राखी की हार्दिक शुभकामनायें
भावना की कोई पराकाष्ठा है क्या
ये अमूर्त कब मूर्त होगा
बहती है अविरल ऐसे ही उदासी नयनो में
कब मधुसुदन का इनसे मिलाप होगा
गंभीर तो महसूस होता
क्या अव्यक्त को ही व्यक्त करे
या व्यक्त की ये ललित छवि कही
श्याम को और श्याम न करे।
सुन्दर ,सजल ,भावपूर्ण प्रस्तुति
बहुत सुंदर
सुंदर भाव मयी पोस्ट
सुंदर सृजन भावपूर्ण प्रस्तुति,,,
RECENT POST : सुलझाया नही जाता.
बेहतरीन कविता
रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएँ।
सादर
स्नेहसूत्र की परिभाषा में
आबद्ध सकल संसार है
धागे से बंधा
ये अदृश्य प्यार है
सुंदर भाव पुष्प !
bahut khoob mn ke sare bhawon ka anokha sangam
निशब्द करने वाली ह्रदय विदारक रचना ..आभार ..
बहुत सुन्दर कविता..
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