अनमने से निकले थे हम… जहां के लिए चले थे वहाँ नहीं जा पाए, बीच में ही एक स्थान पर बस से उतर गए… नोर्दिसका म्यूजियम के आसपास, वहीँ पास में एक झूंड देखा, पंछियों का, मानों उन्होंने पास बुला लिया हो हमें, सुशील तसवीरें लेने में व्यस्त हो गए और हम वहीँ घास पर बैठ गये… वे घूम घूम कर आसपास दृश्यों को कैद कर रहे थे और हम अकेले रह गए वहाँ तो बस शब्दशः जो देखा वो उतार दिया कागज़ पर…! अभी तसवीरें देख रहे थे तो पाया कि जो जैसा लिखा ठीक वैसी ही तसवीरें भी हैं उस शाम की! साथ लगा कर सहेज लेते हैं यहाँ कि याद रह जाये हमें वह शाम अपनी समग्रता में!
कुछ मुस्कानें और एक ख़ुशी:
चुग रहे थे पंछी बड़ी एकाग्रता से जाने क्या मानो किसी ज़रूरी सम्मलेन में हुए हों वे इकठ्ठा और ठीक अभी हुआ हो भोजनावकाश
उनके आयोजन में बिना विघ्न डाले एक मुट्ठी छाँव तलाश कर बैठ गए हम हरी घास की चादर पर
दूर से चला आ रहा था एक पंक्तिबद्ध समूह और देखते देखते ही भीड़ में मिल गया एक बच्चे ने दौड़ाया एक को तो पूरा कुनबा दौड़ गया
फूल खिले थे हर दिशा में लाल, गुलाबी, सफ़ेद, कत्थई और हरित भी विशाल पेड़ उनपर छाँव किये खड़ा था कुछ कुछ चकित ही
हम भी कम विस्मित नहीं थे हमारे जूते थे विश्रामरत पर चल रहे थे हम रंग स्वर और विस्तार के कितने ही टुकड़े चुन रहा था मन!
ज़रा सी हरीतिमा का साथ
खुश होने के लिए चाहिए होते हैं बस थोड़े से ही तो ख़्वाब और उन पर चमचमाती बूँदें बेहिसाब
अनुपमा जी, दरअसल जरा सा हरीतिमा का साथ भी नहीं चाहिए, आप खुश हैं तभी आप हरीतिमा को देख पाते हैं, हजारों लोग आएंगे और उन्हें नहीं दिखेंगे वे पक्षी और न ही हरी घास, यदि हम भीतर तप्त हैं तो बाहर का कुछ भी कहाँ छू पाता है मन को..ख़ुशी तो हमारा स्वभाव है..उसे बांटते हैं हम हरीतिमा के साथ...
13 टिप्पणियाँ:
बहुत बढ़िया..
behtreen chitr aur rochak post....
ज़रा सी हरीतिमा का साथ
खुश होने के लिए चाहिए होते हैं बस थोड़े से ही तो ख़्वाब
और उन पर चमचमाती बूँदें बेहिसाब
सत्य एवं सुंदर ....!!
बहुत सुंदरता से किया दृश्य का वर्णन ....!!
क्या बात, बहुत सुंदर
अहा, सुन्दर दृश्य, सुन्दर कविता, क्यों न कुछ लिखने का मन करने लगे यहाँ।
अनुपमा जी, दरअसल जरा सा हरीतिमा का साथ भी नहीं चाहिए, आप खुश हैं तभी आप हरीतिमा को देख पाते हैं, हजारों लोग आएंगे और उन्हें नहीं दिखेंगे वे पक्षी और न ही हरी घास, यदि हम भीतर तप्त हैं तो बाहर का कुछ भी कहाँ छू पाता है मन को..ख़ुशी तो हमारा स्वभाव है..उसे बांटते हैं हम हरीतिमा के साथ...
वाह बहुत बढ़िया
wah !
पूरी पोस्ट मनमोहक..... वाह
लाजबाब सुंदर अभिव्यक्ति,,
RECENT POST : तस्वीर नही बदली
बहुत बेहतरीन पोस्ट फोटो के साथ !!
सत्य है; खुशियाँ छोटी-छोटी बातों से मिलती भी हैं चली भी जाती हैं। सुन्दर भाव और सरस कविता :)
सही कहा आपने हम चाहें तो हर छोटी चीज़ या बात मे खुशी को ढूंढ सकते हैं और महसूस कर सकते हैं।
सादर
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