बहुत दिन गुजार लिया यहाँ...!

स्वीडन आये चार वर्ष हो जायेंगे इस अगस्त में…! ये "कविता जैसा कुछ" यूँ ही कुछ सोचते हुए: 


जिससे भी मिलते थे
कोई पूर्व परिचय नहीं होता था,
जब आये थे सुदूर देश के इस शहर-
हर मोड़ पर हवाओं का रुख 

अजनबियत के बीज बोता था!


अब अक्सर ऐसा होता है

कोई पहचाना सा टकरा जाता है…
राह चलते या कभी 

बस में कभी ट्रेन में,
कुछ तसवीरें हू-बहू मिलती जुलती है 

पुराने वाले फ्रेम से… 


हाल चाल की 

कुछ बातें…
गुज़रे समय में क्या क्या बीता?

कुछ इन बातों की सौगातें… 


पहचान का अक्स 

कितनी ही शक्लों में 

अब हर मोड़ पर मिल जाता है...


कभी आता जाता था अचरज की तरह 

पर, मेरे लिए अब 

इस शहर में भी मौसम 

बस नियम के अनुरूप बदल जाता है! 



ऐसे तो 

वक़्त का पता नहीं चला, 

पर सोच रहे हैं अब तो लगता है-
बहुत दिन गुजार लिया यहाँ
जाने कितने ही कोणों से पहचान हो गयी है


ठीक वैसे ही 

जैसे कभी कभी लगता है-
बहुत समय हुआ दुनिया में आये
अब शाम हो गयी है!


17 टिप्पणियाँ:

Anupama Tripathi 1 अगस्त 2013 को 12:34 pm बजे  

ठीक वैसे ही
जैसे कभी कभी लगता है-
बहुत समय हुआ दुनिया में आये
अब शाम हो गयी है!

मूलतः हर इंसान भीतर से एक जैसा ही होता है .....!!गहन अभिव्यक्ति है ...
रमने लगता है इंसान जहां भी रहने लगता है ....!!पर फिर भी अपनी माटी की महक याद आती है कभी कभी .....!!
सुंदर अभिव्यक्ति .....!!

Anju (Anu) Chaudhary 1 अगस्त 2013 को 2:54 pm बजे  

वाह ...मन के एक खाली पड़े हिस्से की खूबसूरत सोच

विभा रानी श्रीवास्तव 1 अगस्त 2013 को 2:57 pm बजे  

ठीक वैसे ही
जैसे कभी कभी लगता है-
बहुत समय हुआ दुनिया में आये
अब शाम हो गयी है!
बिल्कुल सच ....

Maheshwari kaneri 1 अगस्त 2013 को 4:06 pm बजे  

बहुत सुन्दर मनोभाव..

Yashwant R. B. Mathur 1 अगस्त 2013 को 4:37 pm बजे  

कल जहां अजनबीपैन लगता था आज वहाँ अपना सा लगता है...यह जान कर अच्छा लगा। लेकिन फिर भी अपनी मिट्टी की बात ही कुछ और होती है। वह आपका साथ कभी नहीं छोड़ेगी।


सादर

अनुपमा पाठक 1 अगस्त 2013 को 4:52 pm बजे  

"अब शाम हो गयी है"
ज़िन्दगी की शाम दुनिया से नाता तोड़ अपने धाम लौटने का सन्देश ले कर आती है...

यहाँ रहने के सन्दर्भ में भी लग रहा है, बहुत दिन बीता यहाँ, शाम हो गयी है!
मन को तो अब लौट जाना है घर!
देखें यह कब हो पाता है...

मिटटी की याद तो हर क्षण बनी ही रहती है!

Dr.NISHA MAHARANA 1 अगस्त 2013 को 5:03 pm बजे  

अब अक्सर ऐसा होता है
कोई पहचाना सा टकरा जाता है…
राह चलते या कभी
बस में कभी ट्रेन में,jivan ki sacchai ko ukerti rachna ....

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया 1 अगस्त 2013 को 7:26 pm बजे  

बहुत खूब सुंदर मन की अभिव्यक्ति,,,

RECENT POST: तेरी याद आ गई ...

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) 1 अगस्त 2013 को 8:02 pm बजे  

सुंदर भावपूर्ण रचना.

ANULATA RAJ NAIR 1 अगस्त 2013 को 8:15 pm बजे  


अभी शाम कहाँ,सूरज तो सर पर चढ़ा है देखो न...
हाँ शाम के धुंधलके में मन उदास होता ही है.....

अनु

Rachana 1 अगस्त 2013 को 9:09 pm बजे  

gahan prastuti
rachana

सदा 2 अगस्त 2013 को 7:16 am बजे  

वाह ... खूबसूरत से अहसास,

शब्‍दों का लिबास पहन

खड़े हो जाते हैं

कागज के आईने में
तो यूँ ही
एक अक्‍़स नज़र आता है

उन शब्‍दों के बीच ... लाजवाब प्रस्‍तुति

मेरा मन पंछी सा 2 अगस्त 2013 को 12:53 pm बजे  

मन की बातो को सादगी से कह दिया है .
बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति..
:-)

Ranjana verma 2 अगस्त 2013 को 1:38 pm बजे  

जीवन दर्शन से अभिभूत कराती रचना.... बहुत बढ़िया .

कविता रावत 3 अगस्त 2013 को 8:13 am बजे  

पहचान का अक्स
कितनी ही शक्लों में
अब हर मोड़ पर मिल जाता है...
..सच पहचान न हो तो कितना नीरस होगा ये संसार सोचकर ही अजीब सा लगता है ...
..बहुत बढ़िया जज्बात ..

Anita 3 अगस्त 2013 को 1:36 pm बजे  

बहुत समय हुआ दुनिया में आये
अब शाम हो गयी है!

शाम के बाद भी एक सुबह होनी है...सुंदर कविता..

प्रवीण पाण्डेय 4 अगस्त 2013 को 11:04 am बजे  

कहाँ भूल पायेंगी इनको,
स्मृतियाँ गाढ़ी होती हैं।

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