ठीक वैसे ही जैसे कभी कभी लगता है- बहुत समय हुआ दुनिया में आये अब शाम हो गयी है!
मूलतः हर इंसान भीतर से एक जैसा ही होता है .....!!गहन अभिव्यक्ति है ... रमने लगता है इंसान जहां भी रहने लगता है ....!!पर फिर भी अपनी माटी की महक याद आती है कभी कभी .....!! सुंदर अभिव्यक्ति .....!!
कल जहां अजनबीपैन लगता था आज वहाँ अपना सा लगता है...यह जान कर अच्छा लगा। लेकिन फिर भी अपनी मिट्टी की बात ही कुछ और होती है। वह आपका साथ कभी नहीं छोड़ेगी।
पहचान का अक्स कितनी ही शक्लों में अब हर मोड़ पर मिल जाता है... ..सच पहचान न हो तो कितना नीरस होगा ये संसार सोचकर ही अजीब सा लगता है ... ..बहुत बढ़िया जज्बात ..
17 टिप्पणियाँ:
ठीक वैसे ही
जैसे कभी कभी लगता है-
बहुत समय हुआ दुनिया में आये
अब शाम हो गयी है!
मूलतः हर इंसान भीतर से एक जैसा ही होता है .....!!गहन अभिव्यक्ति है ...
रमने लगता है इंसान जहां भी रहने लगता है ....!!पर फिर भी अपनी माटी की महक याद आती है कभी कभी .....!!
सुंदर अभिव्यक्ति .....!!
वाह ...मन के एक खाली पड़े हिस्से की खूबसूरत सोच
ठीक वैसे ही
जैसे कभी कभी लगता है-
बहुत समय हुआ दुनिया में आये
अब शाम हो गयी है!
बिल्कुल सच ....
बहुत सुन्दर मनोभाव..
कल जहां अजनबीपैन लगता था आज वहाँ अपना सा लगता है...यह जान कर अच्छा लगा। लेकिन फिर भी अपनी मिट्टी की बात ही कुछ और होती है। वह आपका साथ कभी नहीं छोड़ेगी।
सादर
"अब शाम हो गयी है"
ज़िन्दगी की शाम दुनिया से नाता तोड़ अपने धाम लौटने का सन्देश ले कर आती है...
यहाँ रहने के सन्दर्भ में भी लग रहा है, बहुत दिन बीता यहाँ, शाम हो गयी है!
मन को तो अब लौट जाना है घर!
देखें यह कब हो पाता है...
मिटटी की याद तो हर क्षण बनी ही रहती है!
अब अक्सर ऐसा होता है
कोई पहचाना सा टकरा जाता है…
राह चलते या कभी
बस में कभी ट्रेन में,jivan ki sacchai ko ukerti rachna ....
बहुत खूब सुंदर मन की अभिव्यक्ति,,,
RECENT POST: तेरी याद आ गई ...
सुंदर भावपूर्ण रचना.
अभी शाम कहाँ,सूरज तो सर पर चढ़ा है देखो न...
हाँ शाम के धुंधलके में मन उदास होता ही है.....
अनु
gahan prastuti
rachana
वाह ... खूबसूरत से अहसास,
शब्दों का लिबास पहन
खड़े हो जाते हैं
कागज के आईने में
तो यूँ ही
एक अक़्स नज़र आता है
उन शब्दों के बीच ... लाजवाब प्रस्तुति
मन की बातो को सादगी से कह दिया है .
बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति..
:-)
जीवन दर्शन से अभिभूत कराती रचना.... बहुत बढ़िया .
पहचान का अक्स
कितनी ही शक्लों में
अब हर मोड़ पर मिल जाता है...
..सच पहचान न हो तो कितना नीरस होगा ये संसार सोचकर ही अजीब सा लगता है ...
..बहुत बढ़िया जज्बात ..
बहुत समय हुआ दुनिया में आये
अब शाम हो गयी है!
शाम के बाद भी एक सुबह होनी है...सुंदर कविता..
कहाँ भूल पायेंगी इनको,
स्मृतियाँ गाढ़ी होती हैं।
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