दिखती कोई राह नहीं...!

कौन करे अब
पहले की बातें,
जब वहाँ तक जाती
दिखती कोई राह नहीं... 


कौन पाले
उड़ जाने के सपने,
जब बंध कर
रह जाना है यहीं कहीं... 


कौन रचे अब
रेत किनारे,
है मझधार में
तो मझधार सही... 


जितना
मिलता है,
उससे कहीं अधिक
छूट जाता है;
हम बस उसके पास होने का
एहसास लिए फिरते हैं,
ज़िन्दगी तो हर बार
निकल जाती है और कहीं! 


कौन करे अब
तुझसे बहस,
ज़िन्दगी!
हमें तेरी कोई थाह नहीं... 


जैसे रखेगी अब
रह जायेंगे,
मन में बाकी बची
कोई चाह नहीं...


कौन करे अब
पहले की बातें,
जब वहाँ तक जाती
दिखती कोई राह नहीं...


एक ऐसी सम्भावना जगती
इस हताश क्षण में,
काश! कह पाते
दिखती है एक राह नयी…  

13 टिप्पणियाँ:

विभा रानी श्रीवास्तव 29 अगस्त 2013 को 2:14 am बजे  

इस हताशा के क्षण में
बस धैर्य ही पतवार होता है
समय कोई हो ठहरता नहीं ....
हार्दिक शुभकामनायें

प्रवीण पाण्डेय 29 अगस्त 2013 को 2:43 am बजे  

वाह्य रुका, अन्दर अब देखें,
जग छूटा, अपना सब देखें।

ओंकारनाथ मिश्र 29 अगस्त 2013 को 3:20 am बजे  

जैसे रखेगी अब
रह जायेंगे,
मन में बाकी बची
कोई चाह नहीं...


जीवन वास्तव में खुद निर्धारित करती है हमारी सीमाएं, हमारा वेग. अपने यत्न से हर चीज प्राप्त नहीं होती शायद.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 29 अगस्त 2013 को 3:22 am बजे  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
--
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि का लिंक आज बृहस्पतिवार (29-08-2013) को कृष्णमयी चर्चा ( चर्चा - 1352 )
में "मयंक का कोना"
पर भी है!
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

कौशल लाल 29 अगस्त 2013 को 4:39 am बजे  

काश! कह पाते
दिखती है एक राह नयी…

Saras 29 अगस्त 2013 को 7:15 am बजे  

जड़ों से कटने का दुःख.....सिर्फ इक्षाएं रह जाती हैं ...कहीं भीतर दम तोडती

Madan Mohan Saxena 29 अगस्त 2013 को 8:00 am बजे  

बहुत खूब ,

अरुण चन्द्र रॉय 29 अगस्त 2013 को 8:48 am बजे  

achchi kavita

Yashwant R. B. Mathur 29 अगस्त 2013 को 9:27 am बजे  

बेहतरीन



सादर

आहुति 29 अगस्त 2013 को 2:07 pm बजे  

बेहतरीन अंदाज़..... सुन्दर
अभिव्यक्ति......

राजीव कुमार झा 29 अगस्त 2013 को 2:09 pm बजे  

जितना
मिलता है,
उससे कहीं अधिक
छूट जाता है;
हम बस उसके पास होने का
एहसास लिए फिरते हैं,
ज़िन्दगी तो हर बार
निकल जाती है और कहीं!
बहुत सुन्दर कविता .
http://yunhiikabhi.blogspot.com

मुकेश कुमार सिन्हा 29 अगस्त 2013 को 2:33 pm बजे  

kash dikhti ek nayee rah.......:)

Anita 30 अगस्त 2013 को 9:45 am बजे  

जिन्दगी ऐसी ही है..चिड़िया की तरह, पास जाओ तो फुर से उड़ जाती है..न बुलाओ तो पास आकर बैठ जाती है..यहाँ कुछ चाहना उसका खो जाना है, कुछ त्यागना उसका पा लेना है, तभी तो सन्त कहते हैं..स्वप्न सा संसार है यह...

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