कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे अनायास आ गयी मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...कविता तो मुझसे रूठी है!!
चाँद तनहा है गगन में...
साथ की सारी परिकल्पनाएं विदीर्ण...टूटी है!
आज कैसे अनायास आ गयी मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...कविता तो मुझसे रूठी है!!
सुन्दर...निर्मल...ललित ही नहीं यहाँ...
कुछ ऐसे भी सत्य हैं...जिनकी दर्द भरी श्रुति है!
आज कैसे अनायास आ गयी मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...कविता तो मुझसे रूठी है!!
सच के इस काव्य प्रवाह में...
कोई बात नहीं बनावटी, कोई बात नहीं झूठी है!
आज कैसे अनायास आ गयी मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...कविता तो मुझसे रूठी है!!
प्रेरणापुंज हो आप...
इस सत्य में कहीं न कोई त्रुटी है!
आज कैसे अनायास आ गयी मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...कविता तो मुझसे रूठी है!!
चरणधूलि को चन्दन..रोली..तिलक कहा है...
भावों के संसार की अलग अनुभूति है!
आज कैसे अनायास आ गयी मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...कविता तो मुझसे रूठी है!!
कविता तो मुझसे रूठी है!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
10 जुलाई 2010

10 टिप्पणियाँ:
Nice poem, Anupama!
कुछ बातें हैं तर्क से परे ...
कुछ बातें अनूठी है !
आज कैसे अनायास आ गयी मेरे आँगन में ...
अरे ! एक युग बीता ... कविता तो मुझसे रूठी है !!
I have saved these lines for Muktak Saagar.
I am not sure if you referred to me in this poem :-) But if you did -I am very much honored!
Keep writing...
तर्क से परे का जगत ही सत्य का जगत है.
अद्वैत का संसार.
सत चित आनन्द का लोक!
बहुत सुन्दर कविता! बधाई.
कुछ बातें हैं तर्क से परे ...
कुछ बातें अनूठी है !
आज कैसे अनायास आ गयी मेरे आँगन में ...
अरे ! एक युग बीता ... कविता तो मुझसे रूठी है !!
kavita ka aana yun anayaas hi hota hai ...
bhaavbheeni-si rachna ..
चाहे जो हो ...कविता आप से रूठ ही नहीं सकती। कविता का सौभाग्य है कि आप उसे मनभावन शब्दों मे पिरोती हैं।
सादर
बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (30-06-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ...!
मनोभावों को एक लड़ी में पिरोते हुए बहुत बढ़िया रचना लगी, जिसे लय में पढना बहुत अच्छा लगा ..
बहुत ही सुन्दर रचना है..
बहुत सुन्दर:-)
सुन्दर प्रस्तुति भावों का उद्वेलन करती .,मुझको और अकेला करती ...
चरणधूलि को चन्दन..रोली..तिलक कहा है...
भावों के संसार की अलग अनुभूति है!
आज कैसे अनायास आ गयी मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...कविता तो मुझसे रूठी है!!
....बहुत सुन्दर...
सच के इस काव्य प्रवाह में...
कोई बात नहीं बनावटी, कोई बात नहीं झूठी है!
आपकी कोई भी कविता कभी बनावटी या झूठी नहीं रही हैं,
यह भी अपवाद नहीं है।
बहुत ही खूबसूरत रचना
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