जुदा-जुदा किनारे...



















किनारों को
जोड़ रहे पुल की
विरल गरिमा...


आती जाती धारा
देख रही थी
यह महिमा...


दो किनारों को,
जोड़ देता है,
एक पुल का विश्वास...


गाती है यह महिमा फिर,
हर आती जाती,
श्वास...


एक पुल के विश्वास पर,
हैं जुड़े हुए
दो जुदा-जुदा किनारे...


चल रही है जीवन-नैया,
कौन जाने,
कब नाविक पार उतारे... !!

*** *** ***


[[ तस्वीर :: बुडापेस्ट की एक शाम ]]


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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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