बियाबान जंगल...

जिसकी
खो गयी हो चाभी,
वो ताले रो गए...


रिश्तों के
बियाबान जंगल में
चलते चलते,
पाँव में ही नहीं,
मन में भी छाले हो गए... !!

1 टिप्पणियाँ:

Anita 12 जून 2017 को 10:18 am बजे  

क्यों न हम रिश्तों के उपवन बनाएं फिर उसमें फूलों की चादर बिछायें, पैरों को मिलेगा सुकून और मन तो रहेगा ही नहीं..प्रेम में खो ही जायेगा

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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