धूप में उदासी !


धूप से भी चोट लगती है...
कि आँखों में समा जाये तो
अँधेरा सा छा जाता है!


धूप,
छाँव की
याद दिलाती है...


धूप जो इतनी तेज़ हो
तो हम छाँव के आदी लोगों को
ज़रा ज्यादा ही रुलाती हैं.


आँखों  पर 

हथेलियाँ रख  लीं
धूप से चौंधियाई आँखें 

सुकून क्या पाती ?!



यूँ ठोकरों ने रुलाया
कि आँखों में दर्द उतर आया...


जीवन नियति ऐसी  ही है--


सुख
न धूप में  है
न ही छाँव में 



जीना हो तो,
जी लें, 

अभी इसी क्षण...


कि सुकून कभी नहीं होना है, 

डगमग करती नाव में... !!

2 टिप्पणियाँ:

Jyoti khare 20 जून 2017 को 8:27 am बजे  

वाह
बहुत सुंदर कविता
भावपूर्ण और प्रभावी

Anita 21 जून 2017 को 11:33 am बजे  

सही है..धूप और छाँव से परे समय के इस छोटे से अन्तराल में ही जीवन है..

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