कि "जीवन" जीवन ही नहीं था... !



सबसे ज्यादा हताश थी जब...


दुनिया में कहीं कुछ भी 

ठीक नहीं लग रहा था तब.


खुद से ही बेइंतहा नाराज़गी थी


उस क्षण-


जीवन से अधिक त्याज्य
जैसे कुछ भी और नहीं था...


कि "जीवन" जीवन ही नहीं था... !


इतने अँधेरे कभी नहीं देखे थे
हम तो चाँद तारों को आसमान का सच मानते थे


किसे पता था कि
धरा से चाँद तारों का सामीप्य
सब कोरी कल्पना हैं...


दूरी के ऐसे मानक प्रतिस्थापित हैं
कि जिसकी गणना, कल्पना भी, अकथनीय है...


ऐसे में
ये हमारा भोलापन ही तो रहा होगा
जिसने चाँद तारों से
सामीप्य और नेह के धागे जोड़े होंगे !


यथार्थ  के कठोर धरातल पर सब शुष्क है...
मात्र दूरियां ही तो जीवंत हैं... !!


ऐसी हताशा में
चुपके से
कोमलता के एक प्रतिमान का
स्पर्श महसूस किया हिय ने...


जैसे कह रही हो वह कोमलता--


जीवन है...
अनुभव सा आंकती चलो...


चलते चलते अपने ही भीतर झांकती चलो...


तुम्हें
तुम्हारे सारे जवाब
मिल जायेंगे...
हताश निराश,
विराट नीलेपन से ही,
अनुभूतियों के मोती झिलमिलायेंगे...


उन्हें  चुनकर पिरो लेना...


जीवन का दामन थामे...
फिर "जीवन" ही हो लेना... !!

1 टिप्पणियाँ:

Anita 21 जून 2017 को 11:43 am बजे  

वाह ! कोमलता का वह प्रतिमान अपने ही दिल की गहराई में बसता है..उससे ही जीवन जीवन बन हँसता है..

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

ब्लॉग से जुड़िए!

कविताएँ