स्वप्न से स्मृति तक :: एक पन्ना




आज मन इस पन्ने पर था... हमने शब्दों को पत्थरों पर उकेरा... यूँ ही बेवजह... और ये तस्वीर सजाई...फिर लगा कुछ यूँ बेकार सी बातें ही कभी कभी पूरा हासिल होती हैं ! हम अपने मन को समझाने के लिए ही तो साहित्य और  कविताओं की ओर  देखते  हैं... और कई कई बार कविताओं/शब्दों से बड़ा कोई संबल नहीं होता जीवन में... !!

रचनाकार जब ज़िन्दगी की ओर मुख़ातिब हो कहता है
"अर्सा हुआ मुझको मरते हुए ऐ ज़िन्दगी
अब आई हो कहो, मुझसे कोई काम है"
...तो आँखें नम हो जाती हैं... !! पूरी रचना यहाँ भी सहेज लें... कि पत्थर पर उकेरे तो गए अक्षर पर स्पष्ट कहाँ हैं उतने... पत्थर है न... पहाड़ों से चुना हुआ पत्थर... ऐल्प्स का पत्थर... तो वैसा ही है, पहाड़ों सा... सख्त... खुरदरा... नदी की तलहटी से चुना होता तो वे मुलायम पत्थर होते... उनपर स्पष्ट नज़र आते अक्षर, खैर...
पूरी रचना ::



हैरान हूँ मैं दर पे नामाबर को पा कर
आता नहीं यकीं के ख़त मेरे नाम है


जिस्म को झुकाना तो बस रवायत है
रूह झुके सजदे में तभी सच्चा सलाम है


अर्सा हुआ मुझको मरते हुए ऐ ज़िन्दगी
अब आई हो कहो, मुझसे कोई काम है


हमसफ़र-ओ-ताक़त नहीं हौंसला-ओ-चाहत
क्यों बिछी मेरे आगे ये राहें तमाम हैं


उनकी आंखो से कहीं आंसू ना छलक पड़ें
उनको ना सुनाना ये ललित का कलाम है


--ललित कुमार (स्वप्न से स्मृति तक)
[[22 जुलाई 2006]]

*** *** ***

जीवन कई राहों से गुजरता है... कई मोड़ आते हैं... कभी हम राहों को चुनते हैं... कभी राहें हमें चुन लेती हैं... ! अब ये एक संयोग ही तो है कि आप सा एक bioinformatician, कविताओं और साहित्य के क्षेत्र में इतना बड़ा काम कर रहा है... कविता कोश और कविता कोश के संस्थापक से तो परिचय बाद में हुआ था... हमने तो सर्वप्रथम परिचय की गाँठ "स्वप्न से स्मृति तक" से ही लगायी थी...
याद ले जाती है २०१० तक... कोई यही समय था जून/जुलाई का... "जब स्वप्न से स्मृति" तक पूरा पढ़ा था... फिर मुक्तक सागर को जाना और कविता कोश तो दैदीप्यमान नक्षत्र है ही साहित्याकाश का !!
कविताकोश की पहुँच कहाँ कहाँ तक है ये बस अनुमान की चीज़ है... कल्पना कर के हम चमत्कृत हो सकते हैं बस...  ये आज के लिए है भी नहीं, न ही हमारा सामर्थ्य कि हम इसकी महत्ता आंक सकें... ये आने वाली सदियाँ याद करेंगी कि किसी महान पंडित ने एक महायज्ञ शुरू किया था कभी और कर्मनिष्ठ स्वयं सेवकों का एक समुदाय उस महायज्ञ को सफल बनाने में प्राण पण  से जुटा था... !!
कविता कोश उत्तरोत्तर विकसित हो... हम सब इस बड़े काम में भागीदार हों... कोश  के  इस  जन्मदिन  पर  हम लोग  अपने  कविता  कोश को इस आश्वस्ति का उपहार तो दे ही सकते हैं... !!
*** *** ***
हम बात "स्वप्न से स्मृति तक" की कर रहे थे... पहुँच गए "कविता  कोश"  तक और  मन अभी दशमलव के उस पृष्ठ पर  है  जो  हमें कितनी ही यादों तक ले जाता है...
ये सब यूँ ही रहे हमेशा... और हाँ ये पत्थर सारे संभाल कर रख लिए हैं... इस बार जब भी मिलना हो... चॉकलेट के साथ  पत्थर  भी  लेते आयेंगे आपके लिए !!

1 टिप्पणियाँ:

डॉ. मोनिका शर्मा 1 जुलाई 2017 को 5:28 am बजे  

वाकई प्रभावी है पंक्तियाँ ... मन का जुड़ना स्वाभाविक सा है | ललित जी को शुभकामनाएँ | कविता कोश से सभी हिंदी पढने लिखने वाले जुड़ाव महसूस करते हैं |

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