ख्वाहिशें... !!




कोई एक हो
जो मेरी ख़ामोशी सुन ले...

अब मन
हर एक शब्द अक्षर
सब खोना चाहता है... !


थक गया है
चल चल कर... 


मिले कोई स्नेहपूर्ण गोद
अब मन कुछ देर
सोना चाहता है... !


सब धुल जाये
धुल धक्कड़...


मेरा मन
तुम्हारे हृदय से लग कर
रोना चाहता है... !


रेत ही रेत है
मेरी आँखों के सामने...


जाने फिर भी
कैसे तो हौसला कर
उम्मीदें बोना चाहता है... !!


2 टिप्पणियाँ:

Anita 12 जून 2017 को 10:22 am बजे  

स्वयं से ही उपजा है मन..स्वयं में डूबकर ही विश्राम पायेगा..

संजय भास्‍कर 12 जून 2017 को 4:51 pm बजे  

वाह - बहुत खूब

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
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