सिक्के के दो पहलू...

साधु और शैतान
महज सिक्के के दो पहलू हैं,


पलक झपकते ही बदल जाता है दृश्य
भरम पाले हम
अपनी राह निकल जाते हैं।


अपेक्षित है :
हर एक दोष दंश से ऊपर उठ कर
हमें अपनाया जाए...


कि इंसान हैं हम


माटी के पुतलों की क्या बिसात !


जो साधु होने का गुमान पाले
या कि शैतान होने की लज्जा.


बहती हुई धार रहें बस
गिर जाएं तो कह सकें कि गिर पड़े थे


हाथ थाम कर उठा ले जो कोई लम्हा
कृतज्ञ रहें सदा उस लम्हे का


कभी न भूलें उस पुल को
जिसे पार कर आगे बढ़ आए हों.


बस यूं ही चलता रहे सफर !!


साधु और शैतान हम सबके अंदर है
दोनों का संघर्ष सनातन है


यही प्रार्थना:
संघर्षरत साधु
शैतान से सदैव जीते...


नित चलता रहे सफ़र
तार-तार सपने सीते-सीते... !!


2 टिप्पणियाँ:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 1 जुलाई 2017 को 5:44 am बजे  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा आज शनिवार (01-07-2017) को
"विशेष चर्चा "चिट्टाकारी दिवस बनाम ब्लॉगिंग-डे"
पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Jyoti Dehliwal 1 जुलाई 2017 को 6:22 am बजे  

सही कहा आपने की हर इंसान में साधु और शैतान दोनों का वास होता है और समय परिस्थितियों के अनुसार इसके दर्शन हो जाते है। सुंदर प्रस्तुति।

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

ब्लॉग से जुड़िए!

कविताएँ