सुप्रभातं! जय भास्कर:! ७

पापा से बातचित :: एक अंश 

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सुप्रभातःसर्वेषां कृते! नमस्कारश्च! मंगलकामनासहितमपि। जय भास्करः!

गीता के अठारहवें अध्याय के दसवें श्लोक में कर्म या कर्मफल के त्यागियों में सच्चा त्यागी का स्वरूप बतलाते हुए कहा गया है कि :--
नद्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशलेनानुसज्जते । त्यागी सत्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ।।
अर्थात् जो मनुष्य अकुशल कर्म से द्वेष नही करता (यदि कर्मक्षेत्र में अकुशल (कठिनाई से सिद्ध होने वाला) कर्म आ जाता है तो उससे द्वेष नहीं करता, बल्कि सहज ढंग से उस कर्म का सम्पादन करता है, तथा कुशल कर्म के प्रति आसक्त नहीं होता, अर्थात् मैं केवल सहज सरल रीति से होने वाले कार्य ही करूंगा, इस प्रकार सहज कर्म के प्रति आसक्त नहीं होता वैसे मनुष्य को संशयरहित, बुद्धिमान और सच्चा त्यागी (यानी कर्मनिष्ठ) समझना चाहिए ।पुनः कर्मसिद्धि के पांच कारकों के होने की अनिवार्यता बतलाते हुए चौदहवें श्लोक (अ/18) मे कहा गया है :--
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्। विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्।।
अर्थात् कर्मो की सिद्धि (सफलता) में पांच कारकों के सहयोग की अनिवार्यता होती है :--अधिष्ठान, कर्ता (कार्य सम्पादक), भिन्न भिन्न प्रकार के करण (कर्म करने के साधन, तत्सम्बद्ध इन्द्रिय) एवं विधेय कर्म के लिए विविध चेष्टायें और अन्ततः पांचवें स्थान पर दैव (भाग्य) होता है, मनुष्य के द्वारा पूर्व कृत शुभाशुभ कर्मो के संस्कार (फल, भाग्य) को ही यहां दैव कहा गया है। तात्पर्य यह है कि किसी भी कार्य के सम्पादन में उपर्युक्त पांच कारक हैं, जिसे समझने और तदनुसार चलने का संकल्प हमे भी लेना चाहिए।

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स्वंयसेवा एवं सामाजिक कार्य के संदर्भ में :: एक दृष्टिकोण

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समाज को अगर कोई सचमुच सशक्त और कल्याणकारी बनाना चाहता हो तो, उसे देवाधिदेव महादेव की तरह (जैसे उन्होंने अनन्त कोटि ब्रह्मांड की रक्षा के लिए विषपान कर लिया था) समाज कल्याण के लिए, कटु वचनरूप विष को पीते हुए पारिवारिक विषम स्थिति (विशेष कर विरोधी स्वभाव वाले पारिवारिक सवारी को ही लें :: शिव की सवारी वृषभ, शिवानी की शेर, पुत्र गणेश की सवारी मूषक, कार्तिकेय का मयूर ) को सम करते हुए (जैसे गज मुख पर षडानन् छःमुख वाले कार्तिकेय परिवार को नियंत्रित करने मे सफल हैं), वैसा अभ्यास हम सब को गम्भीरता से अपनाना होगा।


--डॉ सत्यनारायण पाण्डेय 


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