"क्षमा" यह एक प्रसिद्ध शब्द है। क्षमाशील होना मनुष्य का सबसे बड़ा गुण माना जाता है, पर शर्त यह कि उसे शक्तिशाली भी होना चाहिए, क्योंकि शक्तिविहीन के द्वारा क्षमा किया जाना हास्यास्पद लगता है। दिनकर ने कुरूक्षेत्र में लिखा भी है :- क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो, उसको क्या? जो दंतहीन विषरहित विनीत सरल हो।।
अतः हमें प्रयत्न पूर्वक शरीर, मन, बुद्धि विवेक से सबल होना चाहिए । "मनु" शब्द की व्युत्पत्ति है "मननात् मनु" मननशील होना ही मनु की संतान होने के कारण हमारा विशिष्ट गुण है। "मुनि" शब्द भी "मननात् मुनि" से ही बना है। मनन चिन्तन को अपनाते हुए मानवोचित गुणों का हम मे से प्रत्येक को अनुसरण करना चाहिए। नहीं तो आधुनिकता के इस दौर मे भी भौतिक सुख-सुविधा की उपलब्धि के बाद भी मानवोचित गुण से रहित होने के कारण स्थिति भयावह ही होगी। कवि दिनकर पुनः कह उठते हैं:- "झर गई पूंछ रोमान्त झरे, पशुता का झरना बाकी है। ऊपर ऊपर तन संवर चुका, मन अभी संवरना बाकी है।" शायद हम आज भी इस तर्क से झुठला नहीं सकते। आज स्थिति यह हो गई है कि अकेले में मनुष्य खूंखार जानवर से उतना भयभीत नही होता, जितना अकेले में "मानवाकृति" को देखते ही डर जाता है !!
जरा गंभीरता से सोंचे तो सही ।
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प्राचीन काल से यह परम्परा रही है :-- अच्छे कृत्य के लिए प्रशंसा एवं पुरस्कार से अच्छे सेवक या कार्यकर्ता या जो कोई भी हो सुकृत करने वाला हो "सम्मानित किया जाना" एवं गलत कार्य के लिए घोर निन्दा एवं कठोर दण्ड का विधान भी, पर आज स्थिति पारिवारिक स्तर पर ही नहीं, प्रत्येक देश ही नहीं, वैश्विक स्तर पर "झूठे का बोलबाला, सच्चे का मुह काला" चरितार्थ होने लग गया है। क्योंकि हमारी सामूहिक कमजोरी है, गलत के विरुद्ध हम भय वश बोलते नहीं, थोड़े लोग येन केन प्रकारेण अपना उल्लू सिद्ध करने में सफल हो रहे हैं। सोचें कैसे परिवर्तन के युग मे हम जी रहे हैं :-------
एक समय था घर में ताले नहीं लगाए जाते थे, किसी की कोई वस्तु रास्ते में भी गिर जाती थी, तो साफ ऊंची जगह पर राहगीर रख दिया करते थे, या पेड़ की डाली से बांध देते थे ताकि जिसका है उसे आसानी से मिल जाये। आज की स्थिति से हम सब भली भांति परिचित हैं, सात-सात ताले फिर रखवाला रखने के बाद भी हम, हमारा सामान सुरक्षित नहीं। स्वप्न में हरिश्चंद्र ने राज्य दान कर दिया और उस व्यक्ति की प्रतीक्षा में बैठे रहे, और आज वचन से मुकरना, सरासर झूठ बोलना और झूठी गवाही देना कितना सहज स्वीकार्य हो गया है, हमसे छुपा नही है, फिर इस बदले समय में हमें कितने सजग होने की जरूरत है! हम सद्विचार वाले लोग संगठित होकर सोचें। कहा भी है भय वश या लोभ वश गलत करने वाले को नजरअंदाज करना भी अपराध ही कहलाता है, तो हम क्यों न संकल्प लें :--
अकर्तव्यं नैव कर्तव्यं प्राणं कण्ठगतैरपि।
कर्तव्यमेव कर्तव्यं प्राणं कण्ठगतैरपि ।
अर्थात् प्राण कंठगत ही क्यों न हो सात्विक कर्म का किया जाना या अनुमोदन ही श्रेयस्कर है, न कि गलत कार्य का किया जाना या अनुमोदन। हम डटकर देखें तो सही।
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एक सूक्ति संस्कृत में प्रचलित है "स्थान भ्रष्टाः न शोभन्ते दन्ताः, केशाः, नराः, नराः" अर्थात् अपने स्थान से भ्रष्ट हो जाने पर (हट जाने, गिर जाने पर) अपनी शोभा या अपना महत्त्व खो देते हैं, कौन कौन महत्त्व खो देते हैं? दांत, केश, नख और नराः = मनुष्याः = मानव। दांत जबतक मुख में हैं, कहा जाता है, मोती की तरह चमकते दांत हैं ; सिर पर स्थित केशकुन्तल, अहा कितने सुन्दर हैं,आपके केश या केशपास; नख के साथ भी ऐसा ही है, जब तक हाथ की उंगली से जुड़े हैं, सुन्दरता का क्या कहना? वैसे ही नर यानी मनुष्य अर्थात् मानवमात्र जब तक अपने पद, प्रतिष्ठा, मर्यादा के अनुरूप कार्य करता है, समाज उसके स्वागत में पलक पावड़े सजा कर रखता है, पर जैसे ही वह पद प्रतिष्ठा मर्यादा का उल्लंघन करता है, समाज की नजरों में वैसे ही -- तुच्छ, त्याज्य, अश्रद्धा का विषय बन जाता है, जैसे स्वस्थान से हटते ही दांत, केश और नख! अपने अपने स्थान पर रहते हुए तो अपनी और उस व्यक्ति की शोभा के कारक कहलाते हैं, पर स्व स्थान से च्युत होते ही उस व्यक्ति के लिए भी घृणा की वस्तु बन जाते हैं, अन्य जन की दृष्टि में कहना ही क्या? अतः मननशील मनुष्य को चाहिए कि वह अपनी मर्यादा, स्वकर्तव्य पालन से कभी च्युत न हो, नही तो समाज से निन्दित वह "धृतः शरीरेण मृतः स जीवति" की स्थिति मे आ जाता है।
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