भावविभोर लेखनी


जब भरा भरा हो मन
तो चुप हो जाना चाहता है 


पर
आंसू की तरह
कुछ है
जो बेचैन करता है


आँखों से टपकती हैं बूँदें
और कलम का गला रुंध जाता है 


तो
लिखें ही न... ?!!


इस लिखे हुए को
आंसू कह दें... 


या आंसू को
कविता... 


ये भेद मिट जाता है...


शब्दों की गरिमा का
आकलन
फिर अश्रू-जल से हो जाता है... !!





0 टिप्पणियाँ:

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

ब्लॉग से जुड़िए!

कविताएँ