कुछ पड़ाव, कुछ शब्द चित्र



रेल
धीरे धीरे
बढती है गंतव्य की ओर
कितने ही दृश्य
यादों में संजोने


यादें,
जिनका होना है,
न कोई ओर न छोर
बस भागते हुए ही बीतनी है रातें
भागते हुए ही होती है भोर

कभी तो ठहर, ज़िन्दगी!
किसी ठौर


***




हर पड़ाव से बढ़ते हुए
वहीँ कहीं थोड़ा सा
छूट जाते हैं हम

और यूँ छूटते छूटते एक दिन
ख़त्म हो जानी है यात्रा हमेशा के लिए


***



इस एकांत में
विराट पर्वत की
अचलता महसूस की


अथाह पानी के
बहते निर्मल स्वरूप को
आत्मसात किया


पत्तों के हरेपन में
दर्द की हूक सुनी


बारिश की बूंदों में
नेह के उज्ज्वल इंद्रधनुषी रंग देखे


इन सब देखने में
अपनी लघुता भी देखी


प्रकृति के यूं होने की सार्थकता महसूस करते हुए
अपने होने की निरर्थकता को भी जाना


कि यात्राएं हमें हमारे सच तक ही तो ले जाती हैं
हर यात्रा वस्तुत: खुद से खुद की यात्रा ही तो है


***


किस सदी के ईंट पत्थर
ये भी एक अद्भुत मंज़र
इतिहास इन किलों में मुस्कुराता है
अंधेरा यहां, प्रकाश का ही, प्रतिरूप हो जाता है


***


सूरज है तो डूबेगा भी
लेकिन फिर उग आएगा
सवेरा लेकर
जाता है रात को वह
सारी जिम्मेदारियां
चाँद को देकर

कि धरा पर
जितनी बेचैन आत्माएं हैं
सबको चांदनी मिली रहे
जब भोर में उगे वह
तो आस विश्वास की क्यारी
सबके आँगन खिली रहे !!


3 टिप्पणियाँ:

Swarajya karun 27 अगस्त 2017 को 9:04 am बजे  

सुन्दर अभिव्यक्ति .

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 27 अगस्त 2017 को 3:01 pm बजे  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (28-08-2017) को "कैसा सिलसिला है" (चर्चा अंक 2710) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Anita 29 अगस्त 2017 को 11:09 am बजे  

प्रकृति में जो खिला है वही तो मुस्कान बनकर आपमें खिला है..सुंदर पोस्ट..

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