तब जाकर कहीं रोना होता है... !!


आंसुओं से
दुःख धुल जाते हैं...


जब दुःख पहाड़ से हों
आँखें पथरा जाती हैं...


आंसू तब बहुत बौना होता है...


पैठ जाता है जब भीतर तक दुःख,
तक जाकर कहीं रोना होता है... !!


हमने बहुत देर तक
आँखों में एक आंसू के आमद का
इंतज़ार किया...
 

नहीं भीगी आँखें
कि मन पथराया हुआ था !!


भजन की गूँज ने फिर
जाने क्या खोला भीतर 


जैसे बादलों की बोरी के मुख की
गाँठ ग़ ल ती से खुल गयी हो...


विधाता के प्रति
असीम कृतज्ञता से भरा
शरणागत मन रो पड़ा... !!


आसमान!
बरसते हुए तुम अच्छे लगते हो...
लेकिन ज़रा थम कर बरसो 


प्रार्थनायें सुना करो
हाथ जोड़े घुटनों के बल बैठे अब तो हुए हमें वर्षों !!

3 टिप्पणियाँ:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 17 अगस्त 2017 को 12:14 pm बजे  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (18-08-2017) को "सुख के सूरज से सजी धरा" (चर्चा अंक 2700) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
स्वतन्त्रता दिवस और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

सुनीता अग्रवाल "नेह" 18 अगस्त 2017 को 12:14 pm बजे  

वाह सुन्दर

Onkar 19 अगस्त 2017 को 4:07 pm बजे  

सुन्दर रचना

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