स्मृति शेष

यूँ
किसी का नहीं रहना
विश्वासयोग्य नहीं लगता...


आज  सांस लेते हुए 

क्या यकीन कर सकते हैं हम
कि एक दिन 

हम भी नहीं रहेंगे...


जीवन 

इतना बड़ा रहस्य  है...
पर्दा ही नहीं उठता. 


माया मोह से दामन जिस दिन छूटता है...
उस दिन और भी बड़े रहस्य की चादर
ढांप लेती है हमें.


अश्रुपूरित नयन
बस चुपचाप रह जाते हैं...


जीवन मृत्यु के रहस्य की खनक
जाने क्या कहती है ?!


क्यूँ ये त्रासदी है
कि एक दिन
हम बस
स्मृति शेष रह जाते हैं... ?!!

3 टिप्पणियाँ:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 11 अगस्त 2017 को 2:26 pm बजे  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (12-08-2017) को "'धान खेत में लहराते" " (चर्चा अंक 2694) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

'एकलव्य' 11 अगस्त 2017 को 9:35 pm बजे  

बहुत सुन्दर रचना ,आभार
"एकलव्य"

Anita 14 अगस्त 2017 को 10:40 am बजे  

एक दिन नहीं हो जाने वाले हैं हम तो क्यों न आज होने को गहराई से महसूस करें

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