जय हिन्द, जय हिन्द की सेना... !!

पर्वतों की
उस ऊंचाई तक
संदेशे
जाने कैसे पहुँचते होंगे...


उन वीरानों में
कैसे वो
सपनों सा रचते बसते होंगे...


कैसा उनका तेज़ प्रखर
कि वो जीवन जय करते हैं...


अपनों से दूर
निराली अपनी दुनिया में रहते हैं...


मिटटी में रमा हुआ
जो मन है
आंसू भी नत-विनत हँसते होंगे...


उन वीरानों में
कैसे वो
सपनों सा रचते बसते होंगे... !!

2 टिप्पणियाँ:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 15 अगस्त 2017 को 4:15 pm बजे  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (16-08-2017) को "कैसी आज़ादी पाई" (चर्चा अंक 2698) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
स्वतन्त्रता दिवस और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

'एकलव्य' 15 अगस्त 2017 को 5:28 pm बजे  

अति सुन्दर ! क्रांतिकारी रचना आभार ,"एकलव्य"

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
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आज कैसे
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