ज़िन्दगी...

ज़िन्दगी !


तुम्हारी अनुपस्थिति
खलती है.


वो
कहाँ है
किस  हाल में है
सोच-सोच
व्यथित होता है मन


इंतज़ार करती हुई आँखें
जगी-जगी जलती हैं.


ज़िन्दगी
कभी-कभी
लम्बे समय तक
ऐसे भी चलती है.


1 टिप्पणियाँ:

Swarajya karun 25 अगस्त 2017 को 2:07 pm बजे  

सुंदर अभिव्यक्ति . आभार .

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
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कविता तो मुझसे रूठी है!!"

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"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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