अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

मैं प्रेम कवितायेँ नहीं लिखती!

यूँ ही खेल खेल में लिख गयी थी कभी एक कविता एक प्रश्न से प्रेरित होकर... आज यह कविता जाने कैसे याद हो आई...!
बी.एच.यू के केन्द्रीय पुस्तकालय में नियम से जाते थे हम... वहाँ मेरे बगल में अक्सर एक शोध छात्रा बैठा करती थीं... पढ़ते पढ़ते ऊब कर हम कुछ देर के लिए आपस में बातें कर लिया करते थे... धीरे-धीरे कुछ एक कवितायेँ भी उन्होंने सुनी हमसे फिर यूँ ही कह दिया, अरे यार! कोई प्रेम कविता सुनाओ... इतनी कविताओं में तुमने कोई भी ऐसी कविता नहीं लिखी क्या?
ये लिखा था फिर हमने...
आज बाँट लें यहाँ भी!

मैं प्रेम कवितायेँ नहीं लिखती

कहाँ है प्रेम
जीवन के
संत्रासों में?
कहाँ है
वह मीठी सुगंध
स्वार्थ के पाशों में?

हमारे व्यवहारों...
हमारे व्यभिचारों से...
प्रताड़ित,
मानवता है चीखती
इसलिए-
मैं प्रेम कवितायेँ नहीं लिखती!

गिरता है लहू
नयनों के
ओट से
ज़माना है तोलता
सबकुछ केवल
नोट से

अपरिग्रह का सिद्धांत सिरमौर था,
संचय था
तो केवल दान के लिए
चन्द सिक्कों की ख़ातिर अब बिक जाती है आत्मा,
बस सांस ले रहे हैं लोग
वो तत्व ही लुप्त है जो चाहिए प्राण के लिए

टूटते संबंधों की सीलन,
खूंटियों पे
टंगे रिश्ते,
इस अँधेरी गली में
मार डाले गए
जो कुछ एक थे फ़रिश्ते!

इस
कातरता में
पशुता की सारी सीमाएं लांघ जाने की
भयावह तत्परता में
कहाँ है कोमलता...?
कहाँ है जीवन का स्पर्श...?
कहाँ है जिजीविषा...?
कहाँ है निराश माहौल के विरुद्ध हमारा साझा संघर्ष...?
दिखा सको तो दिखाओ
मुझे तो वो रौशनी कहीं नहीं दिखती
इसलिए-
मैं प्रेम कवितायेँ नहीं लिखती!

हर एक बीज
जो अंकुरित होता है
वह प्रेम है!

बर्फ़ीले मौसम में
कहीं दबी कोई एक हरी घास दिख जाती है तो वह
प्रेम की ऊष्मा का ही कमाल है,
समस्त उदासियों का कारण
और उनका निदान भी
प्रेम की ही ढ़ाल है!

मौसम कितना भी भयावह हो
गीत गाये जा सकते हैं
पर, वे गीत हों संघर्ष के उद्घोष के
फिर होंगे अधिकारी हम
उस कोमल संरचना के
जहां उपयुक्त होगा माहौल
प्रेम से कोमल भावों के
अंकन हेतु!

लेकिन,
तब तक
कुछ न होगा
जबतक
मनु की सन्ततियां
अपनी भूलों से कुछ नहीं सीखतीं
मैं प्रेम कवितायेँ नहीं लिखती!

दिखा सको तो दिखाओ
मुझे तो वो रौशनी कहीं नहीं दिखती
इसलिए-
मैं प्रेम कवितायेँ नहीं लिखती!

21 टिप्पणियाँ:

Madhuresh 12 फ़रवरी 2012 को 1:26 am  

हर एक बीज जो अंकुरित होता है, वह प्रेम है!

... दिखा सको तो दिखाओ, मुझे तो वो रौशनी कहीं नहीं दिखती

सूक्ष्मता लिए हुए भाव!
सुन्दर और प्रेरक

काजल कुमार Kajal Kumar 12 फ़रवरी 2012 को 2:26 am  

बढ़िया है जी

Vibha Rani Shrivastava 12 फ़रवरी 2012 को 3:36 am  

तब तक कुछ न होगा ,जबतक ,
मनु की सन्ततियां ,अपनी भूलों से कुछ नहीं सीखतीं.... !
हमारे व्यवहारों...हमारे व्यभिचारों से प्रताड़ित, मानवता है चीखती
इसलिए.... !
आप प्रेम कवितायेँ नहीं लिखती.... :(
लेकिन जबतक ,आप लिखेगी नहीं ,
वो सब होगा कैसे ,जो आप चाहती है.... ?

वन्दना 12 फ़रवरी 2012 को 8:53 am  

बर्फ़ीले मौसम में
कहीं दबी कोई एक हरी घास दिख जाती है तो वह
प्रेम की ऊष्मा का ही कमाल है,
समस्त उदासियों का कारण
और उनका निदान भी
प्रेम की ही ढ़ाल है!…………सुन्दर

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) 12 फ़रवरी 2012 को 9:59 am  

कल 13/02/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

vidya 12 फ़रवरी 2012 को 6:16 pm  

जो कहे कि मैं प्रेम कविता नहीं लिखती...
याने उसकी हर कविता में प्रेम है...बस कहीं दबा छिपा सा...सहमा सा..

सस्नेह..

sangita 12 फ़रवरी 2012 को 7:31 pm  

सुन्दर और प्रेरक

Atul Shrivastava 12 फ़रवरी 2012 को 7:34 pm  

स्‍वार्थ से भरी इस दुनिया में सच्‍चा प्रेम कहां मिलता है.....
गहरे भाव। बेहतरीन अभिव्‍यक्ति।

Prakash Jain 13 फ़रवरी 2012 को 6:32 am  

bahut khub....

सदा 13 फ़रवरी 2012 को 8:41 am  

अनुपम भाव संयोजन ।

संगीता स्वरुप ( गीत ) 13 फ़रवरी 2012 को 10:16 am  

कितनी खरी खरी बात कह दी ... जब चारों ओर संत्रास ही दिखाई दे तो प्रेम कविता कैसे उपजे ?

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') 13 फ़रवरी 2012 को 3:21 pm  

बहुत सुन्दर भाव/संयोजन... वाह.
हार्दिक बधाई..

Aditya 13 फ़रवरी 2012 को 6:40 pm  

लेकिन,
तब तक
कुछ न होगा
जबतक
मनु की सन्ततियां
अपनी भूलों से कुछ नहीं सीखतीं
मैं प्रेम कवितायेँ नहीं लिखती!

waah.. sateek.. :)


palchhin-aditya.blogspot.in

s.chandrasekhar.india 15 फ़रवरी 2012 को 4:58 am  

इससे उपयुक्त कोई प्रेम की कविता हो सकती है क्या? मुझे तो ज्ञात नहीँ ..
अनु इस सुंदर रचना के लिए स्नेहाशीष !

Mukesh Kumar Saxena 15 फ़रवरी 2012 को 4:19 pm  

kasturi kundal vase mrug dhoone van maahi gyan ki roshni aapke bheetar hi milegi vahut hi sundar kavita.

shalini 14 मई 2012 को 2:36 pm  

अनुपमा जी आपकी प्रत्येक कविता स्वयम में अनूठी होती है...... और ये रचना भी इसमें कोई अपवाद नहीं है.... जीवन के कठोर धरातल से परिचय करवाती रचना .

Reena Maurya 14 मई 2012 को 5:13 pm  

बहुत ही सुन्दर कोमल अभिव्यक्ति....

sushma 'आहुति' 19 मई 2012 को 4:44 am  

संवेदनशील रचना अभिवयक्ति.....

Maheshwari kaneri 22 जनवरी 2014 को 7:12 am  

बहुत ही सुन्दर कोमलभाव संजोए है..बधाई...

Incognito Thoughtless 22 जनवरी 2014 को 7:59 am  

बात तो एकदम सही है....
सुन्‍दर प्रस्‍तुति है...।

Yashwant Yash 13 फ़रवरी 2014 को 5:04 am  

कल 14/02/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर

[प्यार का गुल खिलाने खतो के सिलसिले चलने लगे..हलचल का Valentine विशेषांक ]

धन्यवाद !

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