स्वार्थरहित रिश्तों का आकाश...!

एक पुरानी कविता का यूँ याद आ जाना... कभी कहीं खो जाने के बाद... कुछ याद था... कुछ पुनः लिखा... इससे पहले कि फिर खो जाये... सहेज लें!

किसी जन्म का सम्बन्ध रहा होगा
तभी तो वह इतना अपना लगा!
रिश्तों की परिभाषा जाने क्या होती है
मेरे लिए आज है वह सगे से भी अधिक सगा!!

एक मामूली सी पहचान ऐसे भी अर्थ दे सकती है
सोच कर यह विस्मित होता है मन!
बड़ी प्रेरक सी महक है...
जरूर तुम्हें छू कर आ रहा है यह पवन!!

सब ओर होती ऐसी ही
मनोरम छवियाँ... काश!
खून के रिश्तों से कहीं उज्जवल होता है कभी कभी
स्वार्थरहित रिश्तों का आकाश!!

जब दूरी का एहसास हो
तो एक ही गगन के नीचे होने का ख्याल छू जाये!
तुम्हारा कष्ट मेरी आँखों से बहे...
मेरा दर्द तुम्हें रुलाये!!

इस गरिमा की छाँव में
क्या कुछ नहीं जिया जा सकता है!
मेरी आँखों में
एक बेतुका सा सपना बसा रहता है!!

आओ चलो उस सपने की बात करें
तर्क वितर्क को किनारे कर!
ये हो जाये फिर शेष नहीं कुछ
निश्चिंत हो जा सारे कष्ट हमारे हवाले कर!!

ये हम तुम्हारे लिए नहीं
अपने लिए कर रहे हैं!
अपनी नन्ही अंजुरियों में
स्नेहिल किरणें भर रहे हैं!!

किसी जन्म का सम्बन्ध रहा होगा
तभी तो वह इतना अपना लगा!
रिश्तों की परिभाषा जाने क्या होती है
मेरे लिए आज है वह सगे से भी अधिक सगा!!

22 टिप्पणियाँ:

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति 3 जनवरी 2012 को 2:14 pm बजे  

behad sundar rachna... kitna kuch keh jaati hai aise rachnaaye..Maanviy bhavnaon aur rishto kee parton ko kholti jaha koi ankahaa rishta bhi apno se jyada khaas apna hota hai... Anupama ji badhai ..is sundar rachna ke liye

ऋता शेखर 'मधु' 3 जनवरी 2012 को 2:26 pm बजे  

जब दूरी का एहसास हो
तो एक ही गगन के नीचे होने का ख्याल छू जाये!
तुम्हारा कष्ट मेरी आँखों से बहे...
मेरा दर्द तुम्हें रुलाये!!

दिल को छूने वाली रचना..रिश्तों की सही परिभाषा!

vidya 3 जनवरी 2012 को 5:16 pm बजे  

बहुत अच्छा किया अनुपमा जी ,जो सहेजा इस कविता को...वरना इतनी प्यारी रचना पढ़ने से वंचित रह जाते हम.

जब दूरी का एहसास हो
तो एक ही गगन के नीचे होने का ख्याल छू जाये!
तुम्हारा कष्ट मेरी आँखों से बहे...
मेरा दर्द तुम्हें रुलाये!!

बहुत सुन्दर...

Atul Shrivastava 3 जनवरी 2012 को 5:44 pm बजे  

सुंदर रचना।
गहरी अभिव्‍यक्ति।

sourabh sharma 3 जनवरी 2012 को 7:59 pm बजे  

आपकी कविताएं एक अनोखा संसार रचती है जैसे आपके ब्लाग में बना पेड़ और उड़ान भरते पंछी। धरती से एक पवित्र रिश्ता जोड़ती है आपकी कविता। उड़ान भरते पंछियों की तरह

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ 3 जनवरी 2012 को 8:11 pm बजे  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...वाह!

Smart Indian 3 जनवरी 2012 को 11:03 pm बजे  

यही रिश्ता सबसे बड़ा है। आपको नए साल की हार्दिक शुभकामनायें!

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') 4 जनवरी 2012 को 3:30 am बजे  

बड़ी प्रेरक सी महक है...
जरूर तुम्हें छू कर आ रहा है यह पवन!!
बहुत सुन्दर भाव... खूबसूरत कविता...
सादर...

वाणी गीत 4 जनवरी 2012 को 4:06 am बजे  

जन्म के सम्बन्ध भी कई बार इन स्वार्थरहित रिश्तों के आगे बौने हो जाते हैं ...
वही समझते हैं जो इन्हें जीते हैं !
खूबसूरत अभिव्यक्ति !

Nirantar 4 जनवरी 2012 को 5:09 am बजे  

तुम्हारा कष्ट मेरी आँखों से बहे...
मेरा दर्द तुम्हें रुलाये!!
rishton kee intaah !
nice ,very nice
haardik shubhkaanaayein

Anita 4 जनवरी 2012 को 7:11 am बजे  

प्रेम की गहराइयों को छू कर आती पंक्तियाँ ! बहुत कोमल अहसास !

दिलीप 4 जनवरी 2012 को 7:26 am बजे  

hmmm satya vachan..sundar kavita...

abhi 4 जनवरी 2012 को 10:06 am बजे  

देखिये पुरानी कविता का याद आ जाना कितना अच्छा हुआ..आपने सहेज भी लिया, हमने पढ़ भी लिया...

बहुत सुन्दर कविता..खास कर ये बात तो बहुत सच है की -
"खून के रिश्तों से कहीं उज्जवल होता है कभी कभी
स्वार्थरहित रिश्तों का आकाश!!"

Yashwant R. B. Mathur 4 जनवरी 2012 को 10:10 am बजे  

बहुत ही बढ़िया।


सादर

सदा 4 जनवरी 2012 को 12:16 pm बजे  

वाह ...बहुत ही बढि़या ।

आहुति 4 जनवरी 2012 को 6:50 pm बजे  

बहुत खुबसूरत रचना अभिवयक्ति.........

virendra sharma 5 जनवरी 2012 को 7:44 am बजे  

सान्द्र गहन अनुभूति की रचना .कोई अपना सा लगे तो है आज ....नव वर्ष मुबारक .

संगीता स्वरुप ( गीत ) 5 जनवरी 2012 को 7:51 am बजे  

रिश्तों के आकाश में कुछ रिश्ते तारों के समान चमकते दीखते हैं ...

rafat 6 जनवरी 2012 को 10:57 am बजे  

सब ओर होती ऐसी ही
मनोरम छवियाँ... काश!
खून के रिश्तों से कहीं उज्जवल होता है कभी कभी
स्वार्थरहित रिश्तों का आकाश!!
kyaa baat hai ,sunder ahsaas.. arthpurn kwita hai .aap kaa aabhaar.

आनंद 10 जनवरी 2012 को 12:47 pm बजे  

जब दूरी का एहसास हो
तो एक ही गगन के नीचे होने का ख्याल छू जाये!
तुम्हारा कष्ट मेरी आँखों से बहे...
मेरा दर्द तुम्हें रुलाये!!
.....
प्रणम्य हैं ये भाव !

विभा रानी श्रीवास्तव 13 जनवरी 2012 को 2:28 am बजे  

पुरानी कविता का याद आ जाना कितना अच्छा हुआ..आपने सहेज भी लिया, हमने पढ़ भी लिया...

संभाल कर रखियेगा , ये धरोहर होती है.... !!

Suresh Chandra (SC) 28 सितंबर 2013 को 6:24 pm बजे  

एक मामूली सी पहचान ऐसे भी अर्थ दे सकती है
सोच कर यह विस्मित होता है मन!

जब दूरी का एहसास हो
तो एक ही गगन के नीचे होने का ख्याल छू जाये!
तुम्हारा कष्ट मेरी आँखों से बहे...
मेरा दर्द तुम्हें रुलाये!!

ये हम तुम्हारे लिए नहीं
अपने लिए कर रहे हैं!
अपनी नन्ही अंजुरियों में
स्नेहिल किरणें भर रहे हैं!!

अनुशील... सार्थक नाम... नमन... !!

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कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
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