नन्ही लौ और इंसान...!

अन्धकार भयावह है...
विस्तार लिए हुए है
रौशनी नन्ही सी है...
एक लौ में सिमटी हुई है

पर,
जब दोनों देखे जायेंगे
तब एक दूरी से
वह नन्ही लौ ही नज़र आएगी
और सिमटी हुई नन्ही सी लौ
अन्धकार पर भारी पड़ जायेगी!

देखने वाले को
दीया
बड़ी दूर से ही दिख जाएगा
विस्तृत होता हुआ भी
अन्धकार
नहीं दिख पायेगा

गुण तो
छोटी-छोटी पुड़िया में ही
आता है
और
अवगुणों की पूरी ज़मात पर
भारी पड़ जाता है

ज़िन्दगी
कुछ एक मूल सिद्धांतों पर भी
अगर अडिग रहे
प्रेम-दया-करुणा के भाव
मन में
सजग रहे
फिर,
जो एक
अप्राप्य सा लक्ष्य (?) जान पड़ता है-
इंसान होना!
दुर्लभ ही है
औरों
के आँसुओं को
अपनी आँखों से खोना...;
वह स्वतः ही
सहज हो जाएगा
नन्हा दीया जो बन गया मन
वह साक्षात् पुण्यधाम ब्रज हो जाएगा

इंसानियत की बाती के प्रज्वलित होते ही
यह दीये वाला चरित्र
साकार हो जाएगा
देखना यह कलयुग फिर
स्वयं ही सतयुग का
अवतार हो जाएगा!!!

22 टिप्पणियाँ:

Chandrasekhar 20 जनवरी 2012 को 6:15 am बजे  

ये रौशनी नन्हीँ सी, जो लौ मेँ सिमटी हुई है, यही स्वरुप विश्वास का बन हमेँ उस अप्राप्य से लगते हमारे लक्ष्य तक ले जाएगी!
मन के विश्वास को जगाती रचना ..
शुभकामनाएं !

रश्मि प्रभा... 20 जनवरी 2012 को 7:05 am बजे  

जब दोनों देखे जायेंगे
तब एक दूरी से
वह नन्ही लौ ही नज़र आएगी
और सिमटी हुई नन्ही सी लौ
अन्धकार पर भारी पड़ जायेगी!... इसे ही तो समझना है

सदा 20 जनवरी 2012 को 7:06 am बजे  

बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

संगीता स्वरुप ( गीत ) 20 जनवरी 2012 को 7:26 am बजे  

गुण तो
छोटी-छोटी पुड़िया में ही
आता है
और
अवगुणों की पूरी ज़मात पर
भारी पड़ जाता है


बहुत सुन्दर बात कही है ..

vidya 20 जनवरी 2012 को 7:29 am बजे  

वाह...
positivity always wins over negativity...
thats the kye to happiness...

too good!!!

vandana gupta 20 जनवरी 2012 को 8:20 am बजे  

सानियत की बाती के प्रज्वलित होते ही
यह दीये वाला चरित्र
साकार हो जाएगा
देखना यह कलयुग फिर
स्वयं ही सतयुग का
अवतार हो जाएगा!!……………विश्वास जगाती सुन्दर अभिव्यक्ति।

अशोक सलूजा 20 जनवरी 2012 को 8:23 am बजे  

सटीक! कहानी याद आ गईं....आज फिर नन्हे दिए और तूफान की |

कविता रावत 20 जनवरी 2012 को 8:42 am बजे  

गुण तो
छोटी-छोटी पुड़िया में ही
आता है
और
अवगुणों की पूरी ज़मात पर
भारी पड़ जाता है
..ekdam sachhi baat..
aatmjagrati karati sundar rachna

Nirantar 20 जनवरी 2012 को 9:01 am बजे  

sahee kabhee kabhee ek machhar bhee....

संध्या शर्मा 20 जनवरी 2012 को 10:00 am बजे  

इंसान होना!
दुर्लभ ही है
औरों के आँसुओं को
अपनी आँखों से खोना...;

सचमुच ऐसा हुआ तो सतयुग अपने आप साकार हो जायेगा.... सुन्दर

Anita 20 जनवरी 2012 को 10:26 am बजे  

देखने वाले को
दीया
बड़ी दूर से ही दिख जाएगा
विस्तृत होता हुआ भी
अन्धकार
नहीं दिख पायेगा

बहुत सुंदर पंक्तियाँ ! सत्यमेव जयते की गूंज मिलती है...

Yashwant R. B. Mathur 20 जनवरी 2012 को 12:00 pm बजे  

गुण तो
छोटी-छोटी पुड़िया में ही
आता है
और
अवगुणों की पूरी ज़मात पर
भारी पड़ जाता है

बहुत अच्छी बात कहती कविता ।


सादर

Kunwar Kusumesh 20 जनवरी 2012 को 3:16 pm बजे  

विश्वास जगाती रचना .

babanpandey 20 जनवरी 2012 को 5:25 pm बजे  

बहुत ही सार गर्वित बात आपने बातों ही बातों में कह दी .....
प्रेरणादायक

Atul Shrivastava 20 जनवरी 2012 को 8:23 pm बजे  

सुंदर प्रस्‍तुति।

डॉ. मोनिका शर्मा 20 जनवरी 2012 को 9:27 pm बजे  

बहुत सुंदर, सकारात्मक रचना

आनंद 21 जनवरी 2012 को 9:06 am बजे  

गुण तो
छोटी-छोटी पुड़िया में ही
आता है
और
अवगुणों की पूरी ज़मात पर
भारी पड़ जाता है
....

अगर इसे मैं कहूँ तो शायद ऐसे कहूँगा कि " गुण तो एक छोटी से 'गुड़िया' के रूप में आता है ...और सारे अवसाद पर भारी पड़ जाता है "

sushila 21 जनवरी 2012 को 6:50 pm बजे  

रोशनी ही चीरती है, जीतती है अंधकार से और यही उसे करते रहना होगा क्योंकि अंधकार तो नैराश्य है, पराजय है।
सुंदर अभिव्यक्ति ।

shashi purwar 22 जनवरी 2012 को 3:31 am बजे  

bahut sunder prastuti ....har shabd nayab tohfe ki tarah .
nanhi roshni .........badhai .:) bahut pasand aayi kavita . रोशनी ही चीरती है, जीतती है अंधकार से और यही उसे करते रहना होगा क्योंकि अंधकार तो नैराश्य है, पराजय है।
गुण तो
छोटी-छोटी पुड़िया में ही
आता है
और
अवगुणों की पूरी ज़मात पर
भारी पड़ जाता है......nice all lines .:)

abhi 22 जनवरी 2012 को 7:21 am बजे  

देखने वाले को
दीया
बड़ी दूर से ही दिख जाएगा
विस्तृत होता हुआ भी
अन्धकार
नहीं दिख पायेगा

-सच कहा देखने का ही फर्क है सब...
ये पंक्तियाँ कितना कुछ बोलती हैं..

प्रेम सरोवर 22 जनवरी 2012 को 2:41 pm बजे  

आपकी कविता अच्छी लगी । मेरे नए पोस्ट धर्मवीर भारती पर आपका सादर आमंत्रण है । धन्यवाद ।

संतोष पाण्डेय 24 जनवरी 2012 को 10:04 pm बजे  

इतनी सहजता.ऐसा प्रवाह. वाह.

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