जीवन मुट्ठी भर रेत नहीं, है वह गगन का विस्तार!

पीड़ा का विस्तार
कितना छोटा है संसार
सत्य झांक रहा है सितारों के बीच से
चल रहा था, चल रहा है झूठ का व्यापार

नाव की पतवार
संबल है मझधार
जीवन की दुर्गम सुगम राहों पर
होती रहती है, प्रभु की महिमा साकार

जीत हो या हो हार
जगमगाता रहे सौहार्द प्यार
खुली हुई बाहों से सबका स्वागात हो
जीवन मुट्ठी भर रेत नहीं, है वह गगन का विस्तार

जुड़े रहें तार
हो जायेगी नदिया पार
भवसागर के सारे ताप झेल कर
धवल परिपक्व, हो जाएगा मन संसार

जीवन का सार
नयनों से बहती धार
हो भजन के स्वर में सराबोर
न रहे अलौकिक आनंद का पारावार

जीवन के दिन चार
क्यूँ करें किसी अनागत का इंतज़ार
बस पल पल को मन से जीते चले जाएँ
आंसू हो या मुस्कान, दोनों के लिए सहर्ष खोल दिया द्वार

16 टिप्पणियाँ:

dinesh aggarwal 12 जनवरी 2012 को 12:04 am बजे  

जिन्दगी के दिन चार
क्यूँ करें किसी अनागत का इंतजार
बस पल पल को मन से जीते चले जाएँ
आंसू हो या मुस्कान,दोनों के लिए सहर्ष खोल दिया द्वार
गहरी और लाजवाब रचना......

RITU BANSAL 12 जनवरी 2012 को 5:42 am बजे  

कितनी सुन्दर रचना..!!!
kalamdaan.blogspot.com

vikram7 12 जनवरी 2012 को 6:50 am बजे  

. जीवन के दिन चार
क्यूँ करें किसी अनागत का इंतज़ार
बस पल पल को मन से जीते चले जाएँ
आंसू हो या मुस्कान, दोनों के लिए सहर्ष खोल दिया द्वार
वाह....क्या खूब कहा, लाजवाब प्रस्तुति

vidya 12 जनवरी 2012 को 7:32 am बजे  

वाह अनुपमा जी...
बड़ा सुखद संदेसा दे रही है आपकी रचना..
सादर.

Anita 12 जनवरी 2012 को 8:43 am बजे  

जीवन के दिन चार
क्यूँ करें किसी अनागत का इंतज़ार
बस पल पल को मन से जीते चले जाएँ
आंसू हो या मुस्कान, दोनों के लिए सहर्ष खोल दिया द्वार

जो आया ही हुआ है उसका इंतजार भी की क्या करना...तो वर्तमान को ही जीना है सुंदर संदेश देती रचना!

अशोक सलूजा 12 जनवरी 2012 को 8:48 am बजे  

भाई-चारे का सुंदर संदेश ...
दूर-दूर तक पहुचें!
शुभकामनाएँ!

अरुण चन्द्र रॉय 12 जनवरी 2012 को 9:53 am बजे  

सुंदर संदेश ... सुन्दर रचना..!!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 12 जनवरी 2012 को 12:53 pm बजे  

बहुत अच्छी प्रस्तुति!

महेन्द्र श्रीवास्तव 12 जनवरी 2012 को 2:31 pm बजे  

अच्छी रचना
बहुत सुंदर

Yashwant R. B. Mathur 12 जनवरी 2012 को 2:53 pm बजे  

बस पल पल को मन से जीते चले जाएँ
आंसू हो या मुस्कान, दोनों के लिए सहर्ष खोल दिया द्वार

बेहतरीन पंक्तियाँ हैं।


सादर

jai kallikkal 12 जनवरी 2012 को 4:23 pm बजे  

khol diye hein dwar
mann aangan jhankar
Sagar kay agosh mei kar
yah jeevan sansar

jai kallikkal 12 जनवरी 2012 को 4:24 pm बजे  

Very nice Anupama, excellent poem.

विभा रानी श्रीवास्तव 13 जनवरी 2012 को 2:25 am बजे  

जीवन के दिन चार
क्यूँ करें किसी अनागत का इंतज़ार
बस पल पल को मन से जीते चले जाएँ
आंसू हो या मुस्कान, दोनों के लिए सहर्ष खोल दिया द्वार
बहुत ही अच्छी सोच.... हमेशा ऐसा ही रहे..... !!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 13 जनवरी 2012 को 5:49 am बजे  

सुन्दर भावप्रणव रचना।
लोहड़ी की बधाई और शुभकामनाएँ!

Rajesh Kumari 13 जनवरी 2012 को 8:29 am बजे  

bahut sundar bhaavna pradhaan rachna.shubhkamnayen.

Anju (Anu) Chaudhary 13 जनवरी 2012 को 10:10 am बजे  

बेहतरीन रचना ...बधाई स्वीकार करने

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