मृत्यु पर
एक पुस्तक पढ़ती हुई
जीवन के बारे में
सोचती रही...
कैसे इस ओर से उस ओर
हो जाता है प्रस्थान
चल देती है आत्मा
इस धाम से उस धाम
शरीर यहाँ पंचत्व में
विलीन हो जाता है
नियति के हाथों
इंसान कितना दीन हो जाता है
पूर्व निर्धारित घटनाक्रमों के आधार पर
बस अभिनय ही तो करना है
फिर क्यूँ किसी से बैर भाव
चलें ख़ुशी से जितना लिखा हुआ चलना है
पुरुषार्थ
भाग्य बदल देता है
दृढ़ता का सूर्य
हमारी जीवन धरा को रौशनी देता है
उस सूर्य के
प्रकाश में
लीन रहे जो सदा
सत्प्रयास में
उसके जीवन का हर पहर
सत्कर्मों में व्यस्त हो जाता है
चमकता है उसका तेज तब भी
जब जीवन का सूर्य अस्त हो जाता है
जीवन के बाद भी एक जीवन है
जो अपनों की यादों में हम जीते हैं
चक्रवत चल रहा समय है...
आते है फिर वही जो पल भर पहले बीते हैं
उस पल का ध्यान जो हर पल रहे
जब न रहेंगे हम
जब औरों के लिए छोड़ जायेंगे
केवल यादों के मौसम
तब कितने ही क्षणिक जीवन के संताप
क्षण में मिट जायेंगे
जो मिली है ज़िन्दगी
हम उसमें झूमेंगे, नाचेंगे और गायेंगे
जीवन के महोत्सव का आनंद
मन विभोर कर देगा
तब एक विलक्षण जादू
हर निराश शाम को भोर कर देगा
जीवन मृत्यु के बीच की
सूक्ष्म लकीर का ज्ञान रहेगा
तो आजीवन जीवन के प्रति
आभार और सम्मान रहेगा
ये मृत्यु ही है
जो जीवन को विशिष्ट बनाती है
क्षणिकता के सौन्दर्य का
हमको भान कराती है
महत्व उसका ही है
जो खो जाता है
और खोने से पहले संभावनाओं के
अगणित बीज बो जाता है
मिटने का अधिकार
अमरत्व से कहीं श्रेष्ठ है
औ' जीवन अपनी निकृष्टतम दशा में भी
मृत्यु से ज्येष्ठ है
एक घट लगा रहे और उसमें
राम नाम का मोती भरता जाए
स्मित मुस्कान के साथ घर लौटने का सुकून हो मुख पर
जब जीवन हाथ छुड़ाए...!
जीवन-मृत्यु!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
15 जनवरी 2012

24 टिप्पणियाँ:
महत्व उसका ही है
जो खो जाता है
और खोने से पहले संभावनाओं के
अगणित बीज बो जाता है
बहुत सुन्दरता से पूरे जीवन चक्र को चित्रित किया .....
Very beautiful , deep and meaningful composition . Thanks !
मन के समुद्र में गहरे उतर गयीं आप ...और विलक्षण सोच से बाँट रही हैं ...अनमोल मोती ....बहुत सुकून दे रही है आपकी रचना ....मीन मरत जल पायो .....की तरह ...!!!!
बहुत सरल शब्दोँ मेँ जीवन के मौलिक सत्य को लयबद्ध सुंदर रचना मेँ ढाल दिया ..
अतिसुंदर ..
अभिनंदन अनु!
सही है..
पर कितने हैं जो इस आभास से परिचित हैं ..कितने लोग तो ऐसे ज़िन्दगी जीते हैं जैसे 'अमर ' हैं..
विडम्बना है..जो सबसे बड़ा सच है ..उसी को अनदेखा करते हैं..
kalamdaan.blogspot.com
जीवन चक्र की गति को बहुत खूबसूरती से उभारा है।
जीवन मृत्यु के बीच की
सूक्ष्म लकीर का ज्ञान रहेगा
तो आजीवन जीवन के प्रति
आभार और सम्मान रहेगा...addbhut shreshth rachna.jeevan ki sachchaai yahi hai.
विलक्षण भाव समाहित हैं इस कविता में. यह कविता नहीं सारे जीवन का निचोड़ है.
शुभकामनायें सुंदर लेखन के लिये.
सरल शब्दों मे आपने वास्तविक सार प्रस्तुत किया है।
सादर
behad khoob
shashwat satya.... aabhar
मिटने का अधिकार
अमरत्व से कहीं श्रेष्ठ है
औ' जीवन अपनी निकृष्टतम दशा में भी
मृत्यु से ज्येष्ठ है
EXCELLENT..
REGARDS.
महत्व उसका ही है
जो खो जाता है
और खोने से पहले संभावनाओं के
अगणित बीज बो जाता है
Waah! Kyaa khoob kaha hai? Thanks for great post.
ये मृत्यु ही है
जो जीवन को विशिष्ट बनाती है
क्षणिकता के सौन्दर्य का
हमको भान कराती है
बहुत सुन्दर .. गहन भावों को समेटे जिंदगी से रु बी रु कराती रचना ..
जीवन और मृत्यु के दो महत्वपूर्ण स्तंभों पर खड़े जीवन के बीच की सार्थकता को बहुत ही अच्छी तरह से रेखांकित किया है आपने!!
जीवन अभिनय ही तो है।
सुंदर कविता।
जीवन अभिनय ही तो है।
सुंदर कविता।
बहुत गहरे दर्शन को समेटे सुंदर रचना !
गहन दर्शन लिए सुंदर कविता।
बेहतरीन भाव संयोजन ।
जीवन मृत्यु के बीच की
सूक्ष्म लकीर का ज्ञान रहेगा
तो आजीवन जीवन के प्रति
आभार और सम्मान रहेगा...............
बहुत सुन्दर..
बहुत ही बेहतरीन गहन
भाव अभिव्यक्ति है:-)
wakai maut hee jindgi ko khoobsurat banati hai...shandaar shabdon me bade hee rocha tareeke se vyakt kiya hai aapne jeewan darshan...sadar badhayee..holi kee dher sari shubhkamnaon aaur aamantran ke sath
आपका कविता के माध्यम से जीवन-मृत्यु को सरल शब्दों में समझाना अच्छा लगा
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