कुछ भूले बिसरे पन्ने!

२५ अगस्त' २००९ को लिखे गए कुछ पन्ने हाथ आ गए... पढ़ा उन्हें... सहेजने का मन हुआ उन पन्नों को और पढ़ते हुए वो भाव फिर से जी गए हम जब यहाँ स्वीडन आये हफ्ते भर बीते थे बस... दिनचर्या व्यवस्थित नहीं हो पायी थी... सुशील तो आते ही व्यस्त हो गए थे अपने लैब में लेकिन हमारे पास तब बहुत सा खाली वक़्त था... मन में विभिन्न चिंताएं थीं अपनी आगे की पढ़ाई को लेकर... समय के साथ वह सब दो एक महीने में व्यवस्थित हो गया... और पीछे कागजों के ढ़ेर में रह गए वो पन्ने जो अपने घर और अपनी धरती से तुरंत तुरंत दूर हुई बिटिया ने लिखे थे... आज उन पन्नों को पढ़ते हुए बड़ी सिद्दत से यह एहसास हो रहा है कि समय कितनी जल्दी बीत जाता है... दो साल से अधिक हो गए... हरे रंग की स्याही बिलकुल फीकी नहीं पड़ी है और न ही हरे रंग की स्याही से लिखे गए भाव ही फीके पड़े हैं!!!

हरे अक्षरों को यहाँ हु बहु छाप रहे हैं... हरापन बना रहे इन काले अक्षरों में भी... यात्रा के पड़ाव के रूप में संचित, यही आशा है:

आसमान तो एक ही है... लेकिन जगह बदलते ही आसमान के रंग भी बदल जाते हैं। धरती के विभिन्न कोणों से कितना अलग अलग दीखता होगा न आसमान! यहाँ बहुत साफ़ नज़र आती है नभ की विशालता... बादलों का समूह बिलकुल खिड़की से चिपका हुआ सा जान पड़ता है; दूर दूर तक हरियाली... शांत वातावरण... स्वच्छ परिदृश्य... सबकुछ परिष्कृत सा... लगता है मानों यह देश बाँध कर रख लेगा मन को अपने सीमाक्षेत्र में, अपनी छोटी सी दुनिया तो कुछ समय के लिए बस ही गयी है यहाँ अपना भारत अपने साथ समेटे हुए!
आसमान में भागते बादलों की तरह ही यहाँ लोग भी हर क्षण भागते हुए ही दीखते हैं लेकिन एक सुन्दर निश्चिन्तता है उनके चेहरे पर... भले कदमों की गति हर वक़्त किसी गंतव्य की ओर केन्द्रित भाग ही रही होती है... आसपास से अनजान; अपने आप में मग्न लोग... अच्छे हैं लोग... आते जाते मुस्कुरा लेते हैं... पहचान की पहली और आख़िरी सीढ़ी यही एक मात्र अभिवादन!
अकेलापन तो है यहाँ, स्वाभाविक भी है..., पर उदास होने की ज़रूरत नहीं... अकेलापन कहाँ नहीं होता! आदमी हर वक़्त अकेला ही होता है... अपने विचारों के झुरमुट में अकेला... सौ लोगों की भीड़ में बीसियों अपनों के बीच अकेला...; अकेलेपन का अनुभव और एकाकीपन की महिमा के क्या कहने!
बैठे सोच रहे हैं कि जब तक समय, स्थान और योग्यता के अनुरूप कुछ करने का सुअवसर मिले... तब तक विचारों की चित्रकारी चलती रहेगी... और शायद भविष्य में व्यस्त होने के बावजूद भी यह नहीं रुकेगी क्यूंकि धरती पर रंग भरने का प्रयास करने वाले इस मूढ़ को तो अब नीलगगन का विस्तृत कैनवास भी मिल गया है...! विचारों की चित्रकारी चलती रहेगी... भाव भाषा में आबद्ध होते रहेंगे और इस तरह जीवन के कुछ एकाकी पल कलमबद्ध हो जायेंगे! कुछ भी व्यर्थ नहीं होता... जीवन कुछ न कुछ उद्देश्य लेकर ही सांस ले रहा है; हमेशा भौतिक उपलब्द्धि ही मायने रखे ऐसा तो नहीं है... हृदयगत बातें कहीं अधिक दूरी तय करती हैं; किसी की उपलब्द्धि में उसके साथ खड़े होना... उसकी छोटी छोटी बातों का ख्याल रखना... उसके लिए घर लौटने की वजह होना... किसी के लिए उसके अपार्टमेन्ट को घर बनाने वाली कड़ी होना... अपना परिवार अपना सबकुछ पीछे छोड़ किसी का सबकुछ होना- ये सब भी तो काम ही है शायद सबसे बड़ा और सबसे विशिष्ट! जीवन के रंग किस तरह बदलते हैं... जन्म का आँगन पल भर में छूट जाता है और बेटियां परायी हो जाती हैं... जीवन की आपाधापी में यह ख्याल ही नहीं रहता कि कब प्राथमिकताएं बदल गयीं... कब घर छूट गया और अनजानी डगर ही सदा के लिए अपनी हो गयी... ये सब कब क्यूँ हो जाता है किसे ज्ञात; अपने पीछे आभास मात्र छोड़ जाता है आकलन के लिए...!
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आये हुए एक सप्ताह बीत गया... धरती की गोद से नम आँखें लिए उड़ान भरी... बादलों के बीच से होते हुए... बादलों के बहुत ऊपर से धरती को उसी प्रकार देखा जैसे आसमान को निहारते आये थे धरती से...; आसमान तो अब भी दूर था... पर यहाँ से धरती भी बड़ी दूर थी! ऊँचाई से सबकुछ बहुत छोटा नज़र आता है... या यूँ कहें कुछ भी नज़र नहीं आता है...; दूरी तय कर के पुनः धरती की गोद में आ गए... अपनी जगह पर वापस! लेकिन, ये स्थान अपना कहाँ है... ये तो दूसरा देश है... दूसरी दुनिया जहां पंछी कुछ दिनों के लिए अपना घोंसला बसाने आये हैं... दो दूर देश के पंछी जो साथ हैं और अब हमेशा साथ ही रहेंगे; प्यार से तिनका तिनका जोड़ कर धरोहर सहेजेंगे... कुछ विशिष्ट हासिल करेंगे...: वापस संभावनाओं का आकाश साथ लिए जो उड़ना है!
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धुंधली सी सुबह... खिड़की के कांच पर पानी की बूँदें... धुंए की तरह उड़ते हुए आकृतिहीन बादल... ये है स्टाकहोम की एक भींगी भोर...; भींगी धरती... भींगा गगन... भींगी हरियाली की तरोताजा मुस्कान से भावविभोर आत्मा ही जानती है कि भींगना क्या होता है... बेख़ौफ़ टहलना क्या होता है... आसमान से झरते अमृत को अपने आप में समाहित कर लेना क्या होता है...!!! बारहवीं मंजिल में स्थित अपने अपार्टमेन्ट के कमरे की खिड़की से आसमान इतना करीब से महसूस करना भींगने से कम नहीं है...; हृदय की गहराइयों में प्रविष्ट यह नमी क्या हमेशा के लिए सुरक्षित नहीं रह जायेगी... बूंदें, पानी, बादल... सब तो एक ही हैं बस रूप परिवर्तन विविधता को जन्म देता है! मेरे देश की धरती पर बरसने वाले मेघ भी तो इन मेघों जैसे ही हैं...!
अजीब है, इतनी दूर बैठ कर मेरा मन मेघों में समानता ढूंढ रहा है... बूंदों में वही टिपटिप धून सुन रहा है... और फ़ोन पर कही गयी पापा की बात याद कर हंस भी रहा है और रो भी रहा है... पापा कह रहे थे... कि उन्हें अब भी नहीं लगता कि हमें विदा कर दिया है... उन्हें अब भी ऐसा ही लगता है जैसे होस्टल भेजा है और छुट्टियों में बेटी वापस आ जाएगी... ये बातें याद करते हैं तो पतिदेव की सांत्वना मुस्कान ला देती है... वे हमें सांत्वना देते हुए कहते हैं कि वो भी तो अपने घर से दूर हैं... जैसे मेरा घर छूटा, वैसे ही यहाँ आने की वजह से उनका घर भी तो छूटा तो चलो बात बराबर हो गयी...:) सच! मन की उड़ान भी अजीब होती है... कैसे कैसे तर्क ढूंढ लेता है समझने समझाने के लिए क्लिष्ट नियमों का संकट और सच.....


बादलों के शहर की सैर
अपने कमरे के झरोखे से
आँखों में पलते सपने
कुछ बिरले अनोखे से

मुट्ठी में कर ली गयी हो बंद
किरणें कुछ धोखे से
चल पड़ी जो विचारों की आंधी
तो न रुकेगी किसी के रोके से

बादलों के शहर की सैर
अपने कमरे के झरोखे से
...........................!

12 टिप्पणियाँ:

रश्मि प्रभा... 16 जनवरी 2012 को 5:54 am बजे  

बादलों के शहर की सैर
अपने कमरे के झरोखे से
आँखों में पलते सपने
कुछ बिरले अनोखे से
पढ़ते पढ़ते कई गुजरे सपने आँखों में तैर गए और विचारों की आँधियों ने इधर का रुख कर लिया ... ताकि समझ सकूँ उन गुजरे पलों को

vikram7 16 जनवरी 2012 को 6:46 am बजे  

हरे अक्षरों को यहाँ हु बहु छाप रहे हैं... हरापन बना रहे इन काले अक्षरों में भी... यात्रा के पड़ाव के रूप में संचित, यही आशा है:
मुट्ठी में कर ली गयी हो बंद
किरणें कुछ धोखे से
चल पड़ी जो विचारों की आंधी
तो न रुकेगी किसी के रोके से
बेहद पसंद आई आप की यह रचना.आप की हर रचना ए.क नयापन लिए होती है,
''अजीब है, इतनी दूर बैठ कर मेरा मन मेघों में समानता ढूंढ रहा है.'' मन ही तो है,लाजवाब

vikram7: जिन्दगी एक .......

अंजू शर्मा 16 जनवरी 2012 को 7:08 am बजे  

सच! मन की उड़ान भी अजीब होती है... कैसे कैसे तर्क ढूंढ लेता है समझने समझाने के लिए क्लिष्ट नियमों का संकट और सच.....sach hai Anu.....

Nirantar 16 जनवरी 2012 को 8:40 am बजे  

aap likhte raho
ham padthe rahenge man se

RITU BANSAL 16 जनवरी 2012 को 9:09 am बजे  

भावुक संस्मरण ...
आपके ब्लॉग पर आकर अच्छा लगता है ..
kalamdaan.blogspot.com

Anita 16 जनवरी 2012 को 9:13 am बजे  

मुट्ठी में कर ली गयी हो बंद
किरणें कुछ धोखे से
चल पड़ी जो विचारों की आंधी
तो न रुकेगी किसी के रोके से

आपकी यादों के यह पल बहुत अपने से लगे... घर से पहली बार दूर जाने पर शायद ऐसा ही होता है, बहुत रोचक पोस्ट !

Patali-The-Village 16 जनवरी 2012 को 9:16 am बजे  

सशक्त और प्रभावशाली रचना|

vidya 16 जनवरी 2012 को 1:41 pm बजे  

बहुत बहुत सुन्दर...
मन की उड़ान भी अदभुद ..और इसकी सलवटें भी हैरतंगेज़...
सादर.

चला बिहारी ब्लॉगर बनने 16 जनवरी 2012 को 1:53 pm बजे  

भावुक कर देती है आपकी कविता.. और जिस तरह आप संजोकर रखती हैं यादों को वह काबिलेतारीफ है!!

ऋता शेखर 'मधु' 16 जनवरी 2012 को 5:49 pm बजे  

बहुत सुंदर शब्दों में एक एक पल को संजोया है...

Amrita Tanmay 17 जनवरी 2012 को 8:18 am बजे  

बहुत सुंदर संस्मरण |

Anju (Anu) Chaudhary 17 जनवरी 2012 को 11:20 am बजे  

सच में इस मन की गति निराली हैं ....जब जब जो याद रहा वो पल सहज लिया ...

बहुत अच्छा लगा आपके मन की यादो को पढ़ कर

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