आत्ममंथन...?

जोड़ते हैं... जुड़ता भी है...
फिर टूट जाता है,
हमारा विश्वास हमसे
बारबार रूठ जाता है,
कोई एक किरकिरी आकर
सारा दृश्य बिगाड़ देती है
विद्रूपताओं का श्रोत किसी भी क्षण
बरबस फूट आता है!

जितना जुड़ेंगे औरों से
उतना ही दुःख पायेंगे,
समय द्वारा संचालित हैं रिश्ते
रुला कर ही जायेंगे,
ये बदलते दृश्य सब
प्रभाव छोड़ते हैं अपना
अपने आप से रिश्ता कायम हो
ये तत्व ही अंततः काम आयेंगे!

सारे संशय की... सारे उलझन की
जड़ वास्तव में हम ही हैं,
ये जानते हुए भी हल से दूर...
दीन आँखें केवल नम ही हैं,
वह उलझनों को सुलझाने वाला
विवेक कहाँ खोया है?
उत्तर होने का सामर्थ्य रखते हुए भी
केवल प्रश्नों के तम ही हैं!

चलते चलते अनवरत प्रयास से
हर विसंगति का हल निकलेगा,
इसी बंजर धरती से
संभावनाओं का जल निकलेगा,
रहती नहीं देर तक
काली घटाएं आसमान में
यह आज का अन्धकार है प्रमाण
चमकता हुआ यहीं से कल निकलेगा!

27 टिप्पणियाँ:

Nirantar 18 जनवरी 2012 को 10:20 am बजे  

चमकता हुआ यहीं से कल निकलेगा!
sakaaraatmak soch hee ant tah bedaa paar lagaataa hai
saarthak soch kee badhiyaa abhivyakti

संगीता स्वरुप ( गीत ) 18 जनवरी 2012 को 10:27 am बजे  

जितना जुड़ेंगे औरों से
उतना ही दुःख पायेंगे,
समय द्वारा संचालित हैं रिश्ते
रुला कर ही जायेंगे,

ज़बरदस्त आत्ममंथन ..इससे निकली सकारात्मक सोच ..बढ़िया प्रस्तुति

Chandrasekhar 18 जनवरी 2012 को 10:38 am बजे  

अपने आप से रिश्ता कायम करना यानि स्वयं मेँ मौजुद उस ईश तत्त्व से जुड़ना .. उस लक्ष्य तक पहुँचने की हमारी यात्रा सफल हो, ऐसी हम सबकी प्रार्थना रहे!
सादर ..

सदा 18 जनवरी 2012 को 11:15 am बजे  

वाह ...बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

रश्मि प्रभा... 18 जनवरी 2012 को 11:47 am बजे  

सारे संशय की... सारे उलझन की
जड़ वास्तव में हम ही हैं,
ये जानते हुए भी हल से दूर...
दीन आँखें केवल नम ही हैं,
वह उलझनों को सुलझाने वाला
विवेक कहाँ खोया है?
उत्तर होने का सामर्थ्य रखते हुए भी
केवल प्रश्नों के तम ही हैं!... हाँ सच कहा सच कहा

vidya 18 जनवरी 2012 को 12:04 pm बजे  

वाह अनुपमा जी...
सच है...तम में ही कहीं आशा की डोर छुपी होती है..आखों की नमी पोंछ कर देखें और डोर खीचें तो सही...उजाला कैसे नहीं आएगा..
बहुत सुन्दर.

Unknown 18 जनवरी 2012 को 12:08 pm बजे  

हमारा विश्वास हमसे
बारबार रूठ जाता है,

अच्‍छी प्रस्‍तुति

नीरज गोस्वामी 18 जनवरी 2012 को 1:21 pm बजे  

वाह...बेजोड़ रचना...बधाई

नीरज

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 18 जनवरी 2012 को 2:10 pm बजे  

बहुत उम्दा प्रस्तुति!

RITU BANSAL 18 जनवरी 2012 को 2:20 pm बजे  

जितना जुड़ेंगे औरों से
उतना ही दुःख पायेंगे,
समय द्वारा संचालित हैं रिश्ते
रुला कर ही जायेंगे,
ये बदलते दृश्य सब
प्रभाव छोड़ते हैं अपना
अपने आप से रिश्ता कायम हो
ये तत्व ही अंततः काम आयेंगे!
बात तो ठीक है ,पर ये मन फिर भी राह जोता है ,के कोई और उसका हाथ थामे ..
kalamdaan.blogspot.com

अनामिका की सदायें ...... 18 जनवरी 2012 को 4:03 pm बजे  

acchhi prastuti.

Anupama Tripathi 18 जनवरी 2012 को 6:14 pm बजे  

कल की तरह आज भी सूरज निकलेगा ....
प्रभामयी भोर आएगी ही ....!!
sunder rachna ...

ब्लॉग बुलेटिन 18 जनवरी 2012 को 7:17 pm बजे  

इस पोस्ट के लिए आपका बहुत बहुत आभार - आपकी पोस्ट को शामिल किया गया है 'ब्लॉग बुलेटिन' पर - पधारें - और डालें एक नज़र - अंजुरि में कुछ कतरों को सहेज़ा है …………ब्लॉग बुलेटिन

जयकृष्ण राय तुषार 19 जनवरी 2012 को 3:45 am बजे  

अच्छी कविता |

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया 19 जनवरी 2012 को 5:44 am बजे  

वाह!!!!!!!!बहुत सुंदर प्रस्तुति,बेहतरीन पोस्ट
welcome to new post...वाह रे मंहगाई

Anju (Anu) Chaudhary 19 जनवरी 2012 को 7:45 am बजे  

चलते चलते अनवरत प्रयास से
हर विसंगति का हल निकलेगा,
इसी बंजर धरती से
संभावनाओं का जल निकलेगा,


सार्थक सोच की प्रस्तुति ........बहुत खूब

vandana gupta 19 जनवरी 2012 को 8:15 am बजे  

आशा का संचार करती सुन्दर अभिव्यक्ति।

Yashwant R. B. Mathur 19 जनवरी 2012 को 12:01 pm बजे  

कल 20/01/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

डॉ. दिलबागसिंह विर्क 19 जनवरी 2012 को 12:30 pm बजे  

आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
कृपया पधारें

Rajesh Kumari 19 जनवरी 2012 को 2:20 pm बजे  

jo karna hai aaj hi karna hai kal ka kya bharosa.darshnikta se bhari hui prastuti.bahut uttam.

परमजीत सिहँ बाली 19 जनवरी 2012 को 5:21 pm बजे  

अनुपमा जी,बहुत सुन्दर रचना है।बधाई स्वीकारें।

RITU BANSAL 19 जनवरी 2012 को 6:39 pm बजे  

अति सुन्दर ..शब्दों ने कमाल कर दिया..
kalamdaan.blogspot.com

Pallavi saxena 19 जनवरी 2012 को 7:39 pm बजे  

जबर्दस्त आत्ममथन से उपजी बहुत ही सार्थक एवं सकरात्म्क सोच बढ़िया प्रस्तुति आभार

कौशल किशोर 19 जनवरी 2012 को 7:46 pm बजे  

वाह .... आज कुछ मैंने भी ऐसा ही फील किया आपने पंक्तियों में उतार दिया ....हमे इक दूरी बना के रखनी चाहिए .....वरना बहुत तकलीफ होती है...
बधाई ...
मेरी नयी कविता तो नहीं उस जैसी पंक्तियाँ "जोश "पढने के लिए मेरे ब्लॉग पे आयें...
http://dilkikashmakash.blogspot.com/

सदा 20 जनवरी 2012 को 7:00 am बजे  

जितना जुड़ेंगे औरों से
उतना ही दुःख पायेंगे,
समय द्वारा संचालित हैं रिश्ते
रुला कर ही जायेंगे,
बहुत ही सार्थक प्रस्‍तुति ।

आनंद 21 जनवरी 2012 को 9:00 am बजे  

जितना जुड़ेंगे औरों से
उतना ही दुःख पायेंगे,
समय द्वारा संचालित हैं रिश्ते
रुला कर ही जायेंगे,
ये बदलते दृश्य सब
प्रभाव छोड़ते हैं अपना
अपने आप से रिश्ता कायम हो
ये तत्व ही अंततः काम आयेंगे!
..
यद्यपि अपेक्षाएं भी दुःख का कारण बनती हैं...मगर आपसे ऐसी ही रचनाओं कि अपेक्षा रहती है न जाने क्यों !!

abhi 22 जनवरी 2012 को 7:41 am बजे  

बहुत सुन्दर कविता है अनुपमा जी..
आपकी कविताओं की तारीफ़ में वही रिपीटेटीव शब्द कितनी दफे इस्तेमाल करूँ? :) :P

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