कल एक बहुत प्यारी दोस्त से अचानक बात हो गयी... काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रांगन में मेरी कितनी ही कवितायेँ सुनने वाली मेरी प्यारी दोस्त... हम दोनों एक दूसरे को 'आप' ही कहते थे... कल भी बात हुई तो ऐसा लगा जैसे कोई अंतराल आया ही नहीं हो बीच में... ये 'आप' भी वैसे का वैसे था पर आत्मीयता भी वैसी की वैसी थी... मंदिर की घंटियाँ, लाइब्रेरी, जीवन और कविता..., बहुत कुछ याद दिला गई कल की बातचीत... धन्यवाद रचिता!!!
कई बार देखा है
जब बहुत बहुत उदास होते हैं
बिलकुल अकेले होते हैं
तब कोई एक दोस्त
जुगनू सा चमकता हुआ आता है
अपनी दो बातों से
सारा कष्ट हर ले जाता है
अब तो ऐसा है
आशान्वित सा रहता है मन
जब
बहुत दुखी होता है
कि कोई बहुत अच्छी बात
होने वाली है
रोती आँखें हंस कर
फिर और रोने वाली है
किसी पुराने रचित छंद सा
अपना ही कोई
कुछ ऐसी बातें कह जाता है
कि
जीवन के प्रति अविश्वास
तुरंत ढ़ह जाता है
याद आने लगता है
माटी का दिया
जो कभी गंगा की लहरों में
प्रवाहित किया था
और देर तक निहारते रहे थे
कि देखें कहाँ तक जाता है
कहो क्या वो लम्हा
आपको भी याद आता है?
याद आती है
साथ बितायी कुछ एक
सुन्दर घड़ियाँ...
जिनके बलबूते
देखो वर्षों बाद भी मात्र चंद बातें कर के
हम जोड़ लेते हैं सुनहरे पलों की कितनी ही लड़ियाँ...
कभी कभी ही
ऐसा
होता है
पहचान लम्बी न हो
पर फिर भी कोई
बिलकुल अपना हो लेता है
'आप' की औपचारिकताओं से ही
हम निकल नहीं पाए थे
कि वक़्त बीत गया
जितनी कवितायेँ सुनी थी आपने
वह सब वहीँ प्रांगन में
पीछे छूट गया
अब समेटेंगे हम
सबकुछ
धीरे धीरे!
उन अनमोल घड़ियों को
यहीं से जी लेंगे...
जो जी गयीं थीं गंगा तीरे!!
कई बार देखा है
जब बहुत बहुत उदास होते हैं
बिलकुल अकेले होते हैं
तब कोई एक दोस्त
जुगनू सा चमकता हुआ आता है
अपनी दो बातों से
सारा कष्ट हर ले जाता है
अब तो ऐसा है
आशान्वित सा रहता है मन
जब
बहुत दुखी होता है
कि कोई बहुत अच्छी बात
होने वाली है
रोती आँखें हंस कर
फिर और रोने वाली है
किसी पुराने रचित छंद सा
अपना ही कोई
कुछ ऐसी बातें कह जाता है
कि
जीवन के प्रति अविश्वास
तुरंत ढ़ह जाता है
याद आने लगता है
माटी का दिया
जो कभी गंगा की लहरों में
प्रवाहित किया था
और देर तक निहारते रहे थे
कि देखें कहाँ तक जाता है
कहो क्या वो लम्हा
आपको भी याद आता है?
याद आती है
साथ बितायी कुछ एक
सुन्दर घड़ियाँ...
जिनके बलबूते
देखो वर्षों बाद भी मात्र चंद बातें कर के
हम जोड़ लेते हैं सुनहरे पलों की कितनी ही लड़ियाँ...
कभी कभी ही
ऐसा
होता है
पहचान लम्बी न हो
पर फिर भी कोई
बिलकुल अपना हो लेता है
'आप' की औपचारिकताओं से ही
हम निकल नहीं पाए थे
कि वक़्त बीत गया
जितनी कवितायेँ सुनी थी आपने
वह सब वहीँ प्रांगन में
पीछे छूट गया
अब समेटेंगे हम
सबकुछ
धीरे धीरे!
उन अनमोल घड़ियों को
यहीं से जी लेंगे...
जो जी गयीं थीं गंगा तीरे!!

27 टिप्पणियाँ:
कभी कभी ही
ऐसा
होता है
पहचान लम्बी न हो
पर फिर भी कोई
बिलकुल अपना हो लेता है
fb भी यही अहसास का मौका दिला रहा है ,
जो आपकी कविता महसूस करा रही है.... !!
Bdhai, dosti hi aesa rishta hae jismen koi aupcharikta nahin hoti.
गुझे तो लगता है जब तक तू से बात शुरू न हो दोस्ती काग़ज़ी सी रहती है ☺ रचना नि:संदेह बहुत सुंदर हे
अब तो ऐसा है
आशान्वित सा रहता है मन
जब
बहुत दुखी होता है
कि कोई बहुत अच्छी बात
होने वाली है
रोती आँखें हंस कर
फिर और रोने वाली है..
बहुत डूब कर लिखा है आपने अनुपमाजी. इन पंक्तियों के लिये हार्दिक बधाइयाँ.
बहुत ही खुबसूरत ख्यालो से रची रचना......
आदरणीय अनुपमा जी कविता तो बहुत ही सुन्दर है साथ ही साथ अपने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के मेरी भी यादें ताज़ा हो गयी |1993में मैंने भी वहाँ से कानून की डिग्री हासिल किया था |
बहुत सुन्दर...
कभी कभी आत्मीयता समय के बंधन से परे होती है...
कभी कभी ही
ऐसा
होता है
पहचान लम्बी न हो
पर फिर भी कोई
बिलकुल अपना हो लेता है..
बहुत प्यारी रचना...
दोस्ती के रिश्ते निस्वार्थ और स्वर्गिक होते हैं.. बस समर्पण और कुछ नहीं!! मित्रता की मधुर यादों को आपने जिस तरह सजाया है वह अद्भुत है!!
किसी पुराने रचित छंद सा
अपना ही कोई
कुछ ऐसी बातें कह जाता है
कि
जीवन के प्रति अविश्वास
तुरंत ढ़ह जाता है... दम है इस बात में
बहोत अच्छे ।
नया ब्लॉग
http://hindidunia.wordpress.com/
दोस्ती को सहेजती सुन्दर रचना
बहुत सुन्दर प्रस्तुति
आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 30-01-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर भी होगी। सूचनार्थ
hridaysparshi rachna
इस तरह की कविता को पढ़कर एक भावनात्मक राहत मिलती है।
अब समेटेंगे हम
सबकुछ
धीरे धीरे!
उन अनमोल घड़ियों को
यहीं से जी लेंगे...
जो जी गयीं थीं गंगा तीरे!!
बहूत खूब...हृदय में बसी अनमोल घड़ियाँ आनन्ददायक होती हैं|
तब कोई एक दोस्त
जुगनू-सा चमकता हुआ आता है!
अपना ही कोई
कुछ ऐसी बातें कह जाता है
कि
जीवन के प्रति अविश्वास
तुरंत ढ़ह जाता है!
सचमुच ऐसा होता है , कई बार हुआ है !
विश्वास की खूबसूरत अभिव्यक्ति!
यादों को खूबसूरती से सहेजा है।
ये यादें कभी मिट नहीं सकतीं।
सादर
कल 31/01/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!
बहुत ही अच्छी प्रस्तुति ।
मुझे बड़ी अपनी सी लगी ये कविता...बेहद खूबसूरत...
सच है कुछ ऐसे लोग होते हैं जिनसे अगर बात हो जाए तो सारा दुःख पीछे छूट जाता है और चेहरे पे एक मुस्कान आ जाती है...मेरे लिए भी ऐसे दो तीन दोस्त हैं..
और जैसे आपकी सहेली हैं, ठीक उसी तरह मेरे एक मित्र हैं, रवि जी.
हम दोनों एक दूसरे को 'आप' और 'सर' कह कर संबोधित करते हैं(वैसे ऐसे मित्रों की कमी नहीं जिन्हें मैं आप कह कर संबोधित करता हूँ, लेकिन रवि जी की बात अलग है).मैंने भी कितनी ही अपनी कवितायेँ और नोट्स इन्हें सुनाये हैं, और बेचारे सब कुछ झेल जाते हैं...:)
इस वीकेंड फिर से वो आ रहे हैं मुझे झेलने के लिए :)
कभी कभी ही
ऐसा
होता है
पहचान लम्बी न हो
पर फिर भी कोई
बिलकुल अपना हो लेता है
यथार्थ के धरातल पर रची गई सुंदर कविता।
pahachan lambi na ho fir v koi bilkul apna lagta hai. sundar kriti!
वाह बहुत खूब ...
कई बार देखा है
जब बहुत बहुत उदास होते हैं
बिलकुल अकेले होते हैं
तब कोई एक दोस्त
जुगनू सा चमकता हुआ आता है
वाकई ...!!
खूबसूरत यादें
Bik jata hau har rishta duniya me..
Sirf Dosti He Yaha "NOT 4 SALE HAI "
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