अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

शून्य से... शून्य तक!

विस्मित हो न?
आखिर क्या नाता है...
ये है क्या?
जो जोड़ता है हमें...
हमारे बीच...
कितना "वाचाल" है न "मौन"!


शब्दों में ये आत्मीयता घोलता है कौन...!


विस्मय तो हमें भी होता है
हमारा मन भी तर्क वितर्कों में खोता है


फिर कोई तुम्हारी ही भेजी नमी...
मेरी आँखों में चमक जाती है,
जो आंसू तुम्हारे काँधे पर सर रख बहाये थे कभी
उन धारों की याद दिलाती है...!


तब विस्मय सारा मिट जाता है...


मूंदी हुई पलकों से एक अश्रुकण छलक आता है


चलती है फिर एक यात्रा अंतहीन

शून्य से शून्य तक शून्य में ही सब विलीन... ... ...!!
***

यहाँ जो भी है, भाव भाषा... सब प्रेरणा के फूल हैं... हमने बस सहेज भर लेने का काम किया है...!

18 टिप्पणियाँ:

रविकर 7 अक्तूबर 2013 को 12:12 pm  

बढ़िया प्रस्तुति-
आभार आदरणीया-
नवरात्रि की शुभकामनायें-

ई. प्रदीप कुमार साहनी 7 अक्तूबर 2013 को 12:18 pm  

बढ़िया रचना । नवरात्रि की शुभकामनायें |

मेरी नई रचना :- सन्नाटा

expression 7 अक्तूबर 2013 को 12:56 pm  

बहुत सुन्दर........
स्मृतियों की अंतहीन यात्रा........

अनु

राजीव कुमार झा 7 अक्तूबर 2013 को 1:41 pm  

मूंदी हुई पलकों से एक अश्रुकण छलक आता है
फिर चलती है एक यात्रा अंतहीन
शून्य से शून्य तक शून्य में ही सब विलीन... ... ...!!
बहुत सुंदर .

राजीव कुमार झा 7 अक्तूबर 2013 को 1:41 pm  

इस पोस्ट की चर्चा, मंगलवार, दिनांक :-08/10/2013 को "हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल {चर्चामंच}" चर्चा अंक -20 पर.
आप भी पधारें, सादर ....राजीव कुमार झा

Rajesh Kumari 7 अक्तूबर 2013 को 4:45 pm  

आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार ८ /१०/१३ को चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका वहां हार्दिक स्वागत है ।

ajay yadav 7 अक्तूबर 2013 को 4:46 pm  

बहुत ही बढ़िया |
"चलती है फिर एक यात्रा अंतहीन
शून्य से शून्य तक शून्य में ही सब विलीन... ... ...!!"
असीम हैं ,
अनंत हैं |

Kaushal Lal 7 अक्तूबर 2013 को 5:26 pm  

सब शून्य है बहुत सुन्दर ........,नवरात्र की हार्दिक शुभकामना .......

नीरज पाल 8 अक्तूबर 2013 को 7:52 am  

कितना "वाचाल" है न "मौन"!/
चलती है फिर एक यात्रा अंतहीन
शून्य से शून्य तक शून्य में ही सब विलीन... ... ...!!

बहुत ही भावपूर्ण, रिश्तों से रिश्तों तक का सफ़र/ और शून्य में विलीन होता क्षितिज, जीवन कुछ ऐसा ही हैं न?

Anupama Tripathi 8 अक्तूबर 2013 को 10:47 am  

शब्दों में ये आत्मीयता घोलता है कौन...!
अद्भुत भाव रहते हैं आपके काव्य के ...बहुत सुंदर रचना ...!!

आशा बिष्ट 8 अक्तूबर 2013 को 1:17 pm  

बहुत् प्रशंसनीय रचना।

Ashok Saluja 8 अक्तूबर 2013 को 1:29 pm  

आप जो भो कहती हैं ...दिल से कहती हैं !
शुभकामनायें!

दिगम्बर नासवा 8 अक्तूबर 2013 को 2:30 pm  

शून्य से शून्य की यात्रा में मौन ही वाचाल रहता है ... द्डोस से आते सायों के बीच आवाजों का धुंधलापन समझ नहीं आता ...

काजल कुमार Kajal Kumar 9 अक्तूबर 2013 को 1:22 am  

शून्य शून्‍य कहां है

Yashwant Yash 9 अक्तूबर 2013 को 11:45 am  

चलती है फिर एक यात्रा अंतहीन
शून्य से शून्य तक शून्य में ही सब विलीन... ... ...!!

सच को बयान करती कविता

सादर

Anita 9 अक्तूबर 2013 को 2:56 pm  

शून्य से शून्य तक की यह यात्रा कितनी मधुर है..

Maheshwari kaneri 9 अक्तूबर 2013 को 6:42 pm  

बहुत बढ़िया रचना । नवरात्रि की शुभकामनायें |

प्रवीण पाण्डेय 10 अक्तूबर 2013 को 8:24 am  

प्रारम्भ में अव्यक्त, अन्त में अव्यक्त, बीच में ही व्यक्त रहती है यह शून्य से शून्य तक की यात्रा।

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