विस्मित हो न?
आखिर क्या नाता है...
ये है क्या?
जो जोड़ता है हमें...
हमारे बीच...
कितना "वाचाल" है न "मौन"!
शब्दों में ये आत्मीयता घोलता है कौन...!
विस्मय तो हमें भी होता है
हमारा मन भी तर्क वितर्कों में खोता है
फिर कोई तुम्हारी ही भेजी नमी...
मेरी आँखों में चमक जाती है,
जो आंसू तुम्हारे काँधे पर सर रख बहाये थे कभी
उन धारों की याद दिलाती है...!
तब विस्मय सारा मिट जाता है...
मूंदी हुई पलकों से एक अश्रुकण छलक आता है
चलती है फिर एक यात्रा अंतहीन
शून्य से शून्य तक शून्य में ही सब विलीन... ... ...!!
***
यहाँ जो भी है, भाव भाषा... सब प्रेरणा के फूल हैं... हमने बस सहेज भर लेने का काम किया है...!
16 टिप्पणियाँ:
बढ़िया प्रस्तुति-
आभार आदरणीया-
नवरात्रि की शुभकामनायें-
बढ़िया रचना । नवरात्रि की शुभकामनायें |
मेरी नई रचना :- सन्नाटा
बहुत सुन्दर........
स्मृतियों की अंतहीन यात्रा........
अनु
मूंदी हुई पलकों से एक अश्रुकण छलक आता है
फिर चलती है एक यात्रा अंतहीन
शून्य से शून्य तक शून्य में ही सब विलीन... ... ...!!
बहुत सुंदर .
बहुत ही बढ़िया |
"चलती है फिर एक यात्रा अंतहीन
शून्य से शून्य तक शून्य में ही सब विलीन... ... ...!!"
असीम हैं ,
अनंत हैं |
सब शून्य है बहुत सुन्दर ........,नवरात्र की हार्दिक शुभकामना .......
कितना "वाचाल" है न "मौन"!/
चलती है फिर एक यात्रा अंतहीन
शून्य से शून्य तक शून्य में ही सब विलीन... ... ...!!
बहुत ही भावपूर्ण, रिश्तों से रिश्तों तक का सफ़र/ और शून्य में विलीन होता क्षितिज, जीवन कुछ ऐसा ही हैं न?
शब्दों में ये आत्मीयता घोलता है कौन...!
अद्भुत भाव रहते हैं आपके काव्य के ...बहुत सुंदर रचना ...!!
बहुत् प्रशंसनीय रचना।
आप जो भो कहती हैं ...दिल से कहती हैं !
शुभकामनायें!
शून्य से शून्य की यात्रा में मौन ही वाचाल रहता है ... द्डोस से आते सायों के बीच आवाजों का धुंधलापन समझ नहीं आता ...
शून्य शून्य कहां है
चलती है फिर एक यात्रा अंतहीन
शून्य से शून्य तक शून्य में ही सब विलीन... ... ...!!
सच को बयान करती कविता
सादर
शून्य से शून्य तक की यह यात्रा कितनी मधुर है..
बहुत बढ़िया रचना । नवरात्रि की शुभकामनायें |
प्रारम्भ में अव्यक्त, अन्त में अव्यक्त, बीच में ही व्यक्त रहती है यह शून्य से शून्य तक की यात्रा।
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