अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

सिसकियों के उस पार!

एक बहुत पुरानी रचना... उसी पुरानी डायरी से: :


मंजुल मोती की माया से
चमक उठा संसार...
हम चमके सहेज कर
अपने अश्रुकण दो चार! 


आसमान की लाली देख
चहक उठा संसार...
हम चहके पाकर
अपनी वसुधा का प्यार! 


हरियाली के आलम में उपवन संग
महक उठा संसार...
हम महके पाकर
मानवता का आधार! 


परिवर्तन की लहर में
शीशे की तरह चमक उठा संसार...
हम चनके उर के साथ चले अब
सिसकियों के उस पार! 

10 टिप्पणियाँ:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 17 अक्तूबर 2013 को 3:24 am  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बृहस्पतिवार (17-10-2013) त्योहारों का मौसम ( चर्चा - 1401 ) में "मयंक का कोना" पर भी है!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का उपयोग किसी पत्रिका में किया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

निहार रंजन 17 अक्तूबर 2013 को 4:56 am  

काफी खज़ाना है मोतियों का आपकी डायरी में. अति सुन्दर.

Anupama Tripathi 17 अक्तूबर 2013 को 5:14 am  

अद्भुत मंजुल मोती ....!!
बहुत सुंदर रचना .....!!

expression 17 अक्तूबर 2013 को 5:55 am  

पुरानी डायरी की पुरानी रचना...मगर अब भी ताज़ी और एहसासों से महकती हुई है....

सस्नेह
अनु

Yashwant Yash 17 अक्तूबर 2013 को 6:46 am  

भले ही डायरी पुरानी हो पर उससे आने वाली यह खुशबू बहुत ही मनभावन है।


सादर

संगीता स्वरुप ( गीत ) 17 अक्तूबर 2013 को 8:02 am  

खूबसूरत मोती .... चमकदार

दिगम्बर नासवा 17 अक्तूबर 2013 को 9:33 am  

भावभीनी रचना ... दिल की गहराइयों का एहसास लिए ...

Anita 17 अक्तूबर 2013 को 10:26 am  

इसी तरह चमकने का सिलसिला जारी रहे..अनुपमा जी

प्रवीण पाण्डेय 17 अक्तूबर 2013 को 4:27 pm  

परिवर्तन को लालायित है प्रकृति हमेशा।

sushma 'आहुति' 18 अक्तूबर 2013 को 10:55 am  

बहुत ही खुबसूरत और प्यारी रचना..... भावो का सुन्दर समायोजन......

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