अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

"ईश्वर, मेरी कविताएं, शीर्षक विहीन हैं!!"

कई अधूरे ड्राफ्ट्स पड़े हैं, जिन्हें पूरा करना है... लिख जाना है कुछ भावों को, कुछ स्मृतियों को, कुछ विम्बों को... पर अभी शायद समय लगेगा उन एहसासों को पृष्ठ तक आने में...! मन अभी तेरह वर्ष पुरानी डायरी में ही रमा है... पन्ने पलट रहा है और बस कुछ उन लम्हों को जी रहा है... जब कविताओं का होना दोस्तों से घिरा होना होता था... जब स्कूल के दिन थे और कविताओं को साथ कहने गुनगुनाने वाले दोस्त थे...!
श्वेता, ये डायरी पलटी जा रही है तो याद आ रही हो तुम और वो रातें भी जब हम सारी रात कविताओं के साथ बीता दिया करते थे कहते सुनते हुए... हॉस्टल के दिनों में...
इन कविताओं का आधे अधूरे बचे रहना कैंपस की याद दिलाता है... सेंट्रल लाइब्रेरी की याद दिलाता है... त्रिवेणी हॉस्टल की भी महक है इनमें और वो स्कूल के दिनों की यादें भी... कि ये तब की ही कवितायेँ हैं न...!

आज फिर उसी डायरी के बिखरे पन्नों से एक कविता... कच्ची सी... अपनी सी...


एक बार फिर मन जरा हताश है...
फिर एक बार जागी मन में नयी आस है...
क्या गाऊं मैं क्षुद्र अज्ञ आवेश में?
क्या बोलूं मैं तुच्छ, 

तुलसी मीरा के इस देश में?



तोतली बोली का बयान...
क्या करेगा कविता?
कोई मुझ सा अनजान...
क्षमा करे निर्मम निर्णायक समय 

मुझे अबोध जान कर,
मचला जाए मेरी धृष्टता को 

क़दमों तले की घास मान कर... 


पर ढहती दीवारों पर 

मेरी टूटी फूटी पंक्तियों को छोड़ दे,
हे समय! सबकुछ लील जाने की 

अपनी पुरानी प्रथा तोड़ दे!
लड़खड़ाते क़दमों को 

सलीके से चलने का पूरा अवसर मिले
हे समय! कर कुछ ऐसी व्यवस्था---
मुरझाने से पहले हर चेहरा एक बार तो जरूर खिले!


आस्था के अटल होने का मार्ग उद्भासित हो...
हे समय! तुम्हारी प्रतिकूलता से लड़ने का 

कंटकाकीर्ण  मार्ग सुवासित हो!
और इन सबके बीच 

छंदों की शान तनी रहे
कविता कालजयी होती है, 

कविता की मर्यादा सदा बनी रहे! 


अभिव्यक्ति की इस विधा का 

अपना हिय भी है अनुगामी,
बूँदें दिखाई नहीं देतीं 

पर आद्र कर जाता है 

मुसलाधार बरसता पानी!
बस इसी आद्रता से सींचा हृदय 

बीज संवर्धन करता है...
और मेरी बाल सुलभ धृष्टता का मुखर रूप 

शब्दों के झुरमुट में कदम धरता है!


निकल पड़ता है फिर कोई फुट कर श्रोत...
और दिवास्वप्न के साकार होने के से रोमांच से 

कण कण हो जाता है ओतप्रोत!
तब शुरू होती है एक यात्रा अंतहीन...
कविता कभी ख़त्म नहीं होती,

वह तो जीवन की 

पल पल की कर्तव्यनिष्ठा में है 

किरणों सम वितीर्ण!


मुक़म्मल कविता 

या मुक़म्मल इंसान होते ही नहीं... 

इन तत्वों तक सिर्फ राह तय की जाती है!
विश्वास और श्रद्धा के बल पर ही 

तमाम अपूर्णताओं के बावजूद 

ज़िन्दगी जी जाती है! 


वाणी को शब्द मिलें...
ज़िन्दगानी में शब्द ढलें...
वाणी और ज़िन्दगानी को संयुक्त कर दे!
हे समय! कसौटी पर 'कथनी' को 'करनी' से युक्त कर दे!!


कविताओं को जीना 

और फिर उनका लिखा जाना,
रचनाशीलता का हो 

यही पैमाना!

जिस दिन रचित आकार 

हिय के सपने सम होगा...
मुझे विश्वास है, 

उस दिन निश्चित मेरी धरा का गम 

कुछ कम होगा!

बस वह दिन 

अपने आसमान संग 

अपना दिन होगा...
सपनों के अम्बर तले 

छोटा दीपक 

कौतुकपूर्ण संघर्ष से परिपूर्ण होगा! 


और लौ में जो है हवाओं से लड़ने की अक्षय उमंग
हे समय! बस यही एक शय कर दे मेरे संग 


फिर तो हम नन्ही कल्पनाओं से 

धरा का अंचल सजा दें...
तुलसी मीरा के इस देश में 

हिय का तार हम भी अपनी उँगलियों से 

एक बार फिर बजा दें...
धरती पर कण कण की आबद्धता की बात क्या 

फिर तो हम दो जहां की हदें मिला दें...
एक बार जो अमृततत्व हमें मिल जाए, 

फिर तो हम हर मरणासन्न आत्मा को 

जीवन दिला दें...


हे समय! कर कुछ चमत्कार
कि स्वप्न हो साकार!!!

***

आज एक नए ब्लॉग  तक जाना हुआ... पहली पोस्ट पर... मन अभी उन्हीं शब्दों को गुनगुना रहा है...
हमने स्वप्नों को कभी जटिल नहीं होने दिया...
ना अपने किसी भी स्वांग को कुटिल...
संतृप्त की सृजन यात्रा अनवरत चले, अनंत शुभकामनाएं, सुरेश जी...!!!
मेरी एक कविता पर कभी दो पंक्तियाँ लिख गए थे आप...
एक अंध धुंद में, तुम सी ही विलीन हैं...
ईश्वर, मेरी कवितायेँ, शीर्षक विहीन हैं... ... ... !! ~SC~

इन पंक्तियों को पढ़ कर ऐसा लगा जैसे किसी ने हमारा मन पढ़ कर लिख दिए हों ये शब्द... मेरी कितनी ही पुरानी शीर्षकविहीन कवितायेँ जैसे धन्य हो गयीं... इस दिव्य श्रेय के लिए आभार किन शब्दों में कहते हैं, इसका हमें ज्ञान नहीं है, इसलिए आभार की औपचारिकता रहने देते हैं... ये कविता का प्रांगन है न... यहाँ शब्दों से जुड़े हैं हम... हमारे बीच कविता बहती है... यूँ ही बहती रहे सदा सर्वदा...
इस पोस्ट का शीर्षक क्यों न आपकी लिखी पंक्ति ही हो... सत्य, अभिराम, सरल!!! 
"संतृप्त" को "अनुशील" की ओर से कोटि कोटि शुभकामनाएं...!!!
***
इस बार अपनों के आशीषों के प्रताप से ही सुदूर स्वीडन में इतने वर्षों में पहली बार माँ दुर्गा की प्रतिमा के दर्शन हुए, कीर्तन, आरती, पूजा, प्रसाद, पाठ में शामिल होने का मौका मिला... कितने ही वर्षों बाद यूँ पूजा के वातावरण को जिया हमने...

आप सबों को दशहरे की हार्दिक शुभकामनाएं!!!
माँ के दर्शन से संतृप्त हुए हम लौट रहे थे... प्रकृति की गोद में बैठ कर कुछ एक क्षण उस सौन्दर्य को भी जीया जो बिखरा हुआ है वादियों में...
मन यूँ ही अभिभूत रहे, नम रहे, आद्रता बनी रहे कि पतझड़ के बाद फिर बसंत आता है...



12 टिप्पणियाँ:

Onkar 13 अक्तूबर 2013 को 7:17 am  

सुन्दर रचना. सुन्दर चित्र

सरिता भाटिया 13 अक्तूबर 2013 को 10:46 am  

आपकी इस प्रस्तुति की चर्चा कल सोमवार [14.10.2013]
चर्चामंच 1398 पर
कृपया पधार कर अनुग्रहित करें |
रामनवमी एवं विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाओं सहित
सादर
सरिता भाटिया

vibha rani Shrivastava 13 अक्तूबर 2013 को 12:49 pm  

विजया दशमी की हार्दिक शुभकामनायें
स्वस्थ्य और सफल दीर्घायु हो

Yashwant Yash 13 अक्तूबर 2013 को 12:57 pm  

मुक़म्मल कविता
या मुक़म्मल इंसान होते ही नहीं...
इन तत्वों तक सिर्फ राह तय की जाती है!
विश्वास और श्रद्धा के बल पर ही
तमाम अपूर्णताओं के बावजूद
ज़िन्दगी जी जाती है!

सच तो यही है।

आपको सपरिवार विजय दशमी की हार्दिक शुभ कामनाएँ।

सादर

Maheshwari kaneri 13 अक्तूबर 2013 को 2:19 pm  

सुन्दर प्रस्तुति,......विजयादशमी की शुभकामनाएँ

प्रवीण पाण्डेय 13 अक्तूबर 2013 को 6:19 pm  

पुरानी कविताओं के साथ बैठिये, पुराने दिन भी याद आयेंगे और कवितायें नये परिप्रेक्ष्य में पूरी भी हो जायेंगी।

Saurabh 14 अक्तूबर 2013 को 11:00 am  

एक अरसे बाद कैसे-कैसे तो भेंट हुई है !

कविता-यात्रा से गुजरना सुखकर लगा. यात्रा अनवरत रहे. विरामहीन. ..
किसी गंतव्य का निश्चित न होना यात्रा को कितना अपना-अपना सा बना देता है ! अपने मूल स्वभाव के अनुरूप-अनुकूल !

शुभ-शुभ
सौरभ

Swarajya karun 14 अक्तूबर 2013 को 5:53 pm  

@क्या गाऊं मैं क्षुद्र अज्ञ आवेश में?
क्या बोलूं मैं तुच्छ,
तुलसी मीरा के इस देश में?-
दिल को छू जाने वाली पंक्तियाँ ! आभार . विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएं.

Shekhar Suman 16 अक्तूबर 2013 को 6:41 am  

अक्सर वो कवितायें हुमें ज्यादा अच्छी लगती है जो इनके अधूरेपन की वजह से कभी किसी को सुनाई न गयी हो....

राजीव कुमार झा 16 अक्तूबर 2013 को 11:23 am  

मन के भावों का बहुत अच्छी तरह शब्दांकन.

राजीव कुमार झा 16 अक्तूबर 2013 को 11:28 am  

इस पोस्ट की चर्चा, बृहस्पतिवार, दिनांक :-17/10/2013 को "हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल {चर्चामंच}" चर्चा अंक -26 पर.
आप भी पधारें, सादर ....

Meena Pathak 17 अक्तूबर 2013 को 5:23 pm  

सुन्दर प्रस्तुति

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कुछ बातें अनूठी है!
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